मंगलवार, 21 नवंबर 2017

मानव और प्रकृति में संतुलन

इन दिनों प्रायः देश के किसी ने किसी भाग से गांव में घुस आये बाघ, हाथी आदि जंगली जानवरों की चर्चा होती रहती है। बस्ती के आसपास मित्र की तरह रहने वाले कुत्ते और बंदरों का आतंक भी यदा-कदा सुनने को मिलता रहता है। इन्हें मारने पर पशुप्रेमी संस्थाएं शोर करती हैं। अतः कुछ राज्य सरकारें इनकी नसबंदी करा रही हैं। इससे लाभ होगा या हानि, यह तो 20-25 साल बाद ही पता लगेगा।

मानव और पशु-पक्षियों का साथ सदा ही रहा है। भारतीय और विदेशी साहित्य में इनकी पर्याप्त चर्चा है। सृष्टि में शाकाहारी से लेकर मांसाहारी तक, लाखों तरह और आकार-प्रकार के प्राणी हैं। उनमें से कई का तो हमें अभी तक पता ही नहीं है। जैसे शरीर में कई अंग दिखायी देते हैं, तो कई नहीं। कुछ छोटे हैं, तो कुछ बड़े। फिर भी हर अंग का अपना महत्व एवं उपयोग है। सब एक-दूजे पर आश्रित हैं। यही स्थिति विभिन्न जीव-जंतुओं की है। इसलिए कुछ जीवों को सृष्टि से पूरी तरह मिटा देने के प्रयास कभी भी उचित नहीं कहा जा सकता।

एक बार चीन सरकार ने तय किया कि छोटी चिड़ियां बहुत अन्न खा लेती हैं, अतः उन्हें मार दिया जाए। एक निश्चित दिन सब लोग अपनी छतों पर आ गये। शोर मचाकर चिड़ियों को उड़ाया गया। जैसे ही वे थककर बैठने लगतीं, लोग उन्हें फिर उड़ा देते। कुछ ही घंटों में करोड़ों चिड़ियां मर गयी; पर अन्न की बर्बादी उस साल पहले से भी अधिक हुई। क्योंकि वे चिड़ियां अन्न के साथ ही खेती के लिए हानिकारक कीड़े भी खा लेती थीं। चिड़ियों के मरने से कीड़ों की संख्या बहुत बढ़ गयी और वे पूरी फसल खा गये। ऐसे उदाहरण विश्व इतिहास में एक नहीं, हजारों हैं।

लेकिन अब एक ओर मानव जनसंख्या, तो उसके साथ ही भौतिक सुविधाओं की अंधी होड़ भी लगातार बढ़ रही है। अतः जल और जंगल जैसे प्राकृतिक संसाधनों का तेजी से विनाश किया जा रहा है। इससे प्रकृति का संतुलन बिगड़ रहा है तथा पशु भी मजबूरी में हिंसक और उपद्रवी हो रहे हैं।

लगभग 15 साल पुरानी बात है। मैं उन दिनों लखनऊ में रहता था तथा गरमी में खुली छत पर सोता था। इससे सुबह उठते समय शरीर बहुत प्रफुल्लित रहता था। वहां पंखे की जरूरत नहीं पड़ती थी, अतः बिजली भी बचती थी; पर अचानक उस मोहल्ले में आने वाले बंदरों की संख्या बहुत बढ़ गयी। वे दिन के साथ रात में भी आने लगे। मैं एक बरतन में वहां पानी रखने लगा, जिससे उसे पीकर वे लौट जाएं; पर प्रायः वे छत पर ही डेरा डाल देते थे। अतः मुझे कूलर लगाकर अंदर सोने पर मजबूर होना पड़ा। कारण ढूंढने पर पता लगा कि लगभग पांच कि.मी. दूर का जंगल साफ कर एक नयी कालोनी बन रही है। अतः उस जंगल में बसे बंदर परेशान होकर शहर में आ रहे हैं।

बिल्कुल यही स्थिति हाथियों और बाघ आदि की है। मनुष्य अपने आवास, व्यापार या मनोरंजन के लिए जंगल में घुस रहा है, तो जानवर कहां जाएं ? उनके पास तो कोई घर, दुकान या खेती नहीं होती। जंगल ही उनके रहने और खाने का सहारा है। देहरादून, हरिद्वार और ऋषिकेश की सड़कों पर प्रायः हाथी आ जाते हैं। उनके आते ही वाहन चुपचाप पीछे हटकर खड़े हो जाते हैं। जल स्तर गिरने से कई जंगलों में तालाब सूख गये हैं। अतः प्यासे पशु मीलों दूर गंगा तक आ जाते हैं। मांसाहारी पशु रात में शिकार करते हैं और दिन में सोते हैं; पर दिन में उन जंगलों की सड़कों पर वाहन दौड़ने लगे हैं। पर्यटक उनकी नींद खराबकर फोटो खींचते हैं। कई जंगलों में होटल बने हैं। वहां शादी या पार्टी में कानफोड़ संगीत से भी पशु परेशान होते हैं। जहां जंगलों में रेल लाइनें हैं, वहां भी यही समस्या है।

ऐसी समस्याओं का हल दो और दो चार जैसा सरल नहीं है। विकास केे लिए सड़क और रेलगाड़ियां जरूरी हैं। बढ़ती जनसंख्या के लिए घर भी चाहिए। शहरीकरण के रुकने की भी कोई संभावना नहीं है। अतः हमें प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलना सीखना होगा। जितना हम ले रहे हैं, उससे कुछ अधिक उसे नहीं लौटाएंगे, तो हमारी भावी पीढ़ियों को बहुत कष्ट भोगने होंगे। यद्यपि विज्ञान कई चीजों का उत्तर ढूंढ लेता है; पर कई बार आज का समाधान 25 साल बाद नयी समस्या बन जाता है।

1965 के युद्ध के समय अमरीका ने हमें गेहूं देने से मना कर दिया था। तब हम अन्न के मामले में आत्मनिर्भर नहीं थे। ऐसे में राजनीतिक नेतृत्व ने कृषि वैज्ञानिकों को चुनौती दी। इससे हुई ‘हरित क्रांति’ से हम खाद्यान्न में आत्मनिर्भर तो हुए, पर रासायनिक खाद और कीटनाशकों से खेतों की उर्वरता घट गयी। अतः हर बार अपेक्षाकृत अधिक खाद आदि लगने लगीं। रासायनिक अन्न और चारे से मानव और पशुओं में नये रोग आ गये। कम समय की फसलों से पानी का खर्च बढ़ गया। अतः जल की समस्या आ गयी। अब सब परेशान हैं कि क्या करें ?

यही हाल बढ़ती गरमी का है। इससे निबटने को विज्ञान ने फ्रिज और ए.सी. आदि बना दिये। अतः हर कार, घर और दफ्तर में ए.सी. लगने लगे हैं; पर अब ध्यान आ रहा है कि जितने ए.सी. लग रहे हैं, गरमी उतनी ही बढ़ रही है। सूर्य और धरती के बीच की ओजोन परत लगातार छीज रही है। हिमानियों के पिघलने से समुद्र आगे बढ़कर निकटवर्ती नगरों और देशों को निगल रहे हैं। अतः चांद और मंगल पर बस्तियां बसाने की बात होने लगी है।

इस बारे में हिन्दू चिंतन सही दिशा दिखाता है। भारत में अच्छा खाना-पहनना कभी मना नहीं था। देवताओं को 56 व्यंजनों का भोग लगता था। आम आदमी की थाली में भी चार-छह चीजें रहती थीं। सोने-चांदी के बरतनों का प्रयोग भी होता ही था। आज भी बच्चे के अन्नप्राशन पर चांदी के छोटे चम्मच, कटोरी या गिलास देते हैं। मंदिर में अष्टधातु की मूर्तियां, स्वर्ण मुकुट और आभूषण आम बात हुआ करती थी; लेकिन उपभोग पर संयम का चाबुक भी था। ‘ईशोपनिषद’ में सृष्टि की हर चीज को ईश्वर की बताकर ‘त्येन त्यक्तेन भुंजीथा’ (त्यागपूर्वक उपभोग करो) कहा गया है। प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर चलने का अर्थ यही है।

एक 75 वर्षीय बुजुर्ग को अखरोट का पेड़ लगाते देख एक यात्री ने आश्चर्य से कहा, ‘‘बाबा, तुम्हारे पांव शमशान की ओर मुड़े हैं। 40 साल बाद जब यह पेड़ फलेगा, तब तुम कहां होगे ?’’ बुजुर्ग ने हंसकर कहा, ‘‘मैंने बचपन और जवानी में जिन पेड़ों के अखरोट खाये थे, वे मेरे दादा और पिता ने लगाये थे। ये पेड़ में अपने नाती-पोतों के लिए लगा रहा हूं।’’

कहानी भले ही छोटी हो, पर उसका अर्थ गहरा है। प्रकृति के साथ चलने का अर्थ केवल अपनी नहीं, अपनों की चिंता करना भी है। केवल आज नहीं, तो कल और परसों के बारे में सोचना भी है। इसलिए भारत की हर समस्या अमरीका या इंग्लैंड की तरह हल नहीं होगी। विकास का अर्थ बड़ा घर और गाड़ी; बिजली, पानी और शराब का अधिक उपभोग; कपड़े, गहने या जूतों से भरे कमरे नहीं है। विकास का अर्थ है मानव और प्रकृति के बीच संतुलन। भगवान ने हमारी तरह ही पशु-पक्षी और पेड़-पौधों को भी बनाया है। इनका संरक्षण, संवर्धन और इनके साथ सामंजस्य बनाकर चलने का काम सृष्टि में सबसे अधिक बुद्धिमान प्राणी होने का दावा करने वाले मनुष्य का ही है।

शुक्रवार, 10 नवंबर 2017

भारी धुंध और गोवंशीय खेती

इन दिनों दिल्ली और पूरा उत्तर भारत भारी धुंध से परेशान है। प्रशासन ने कई जगह अगले आदेश तक छोटे बच्चों के स्कूल बंद करा दिये हैं। सांस तथा फेफड़े के मरीजों को विशेष सावधानी रखने तथा अधिकाधिक तरल पदार्थ लेने को कहा जा रहा है। सुबह टहलने जाने वालों को भी कुछ दिन घर पर ही रहने की सलाह दी गयी है। अनेक सार्वजनिक कार्यक्रम निरस्त किये जा रहे हैं।

आजकल टी.वी. पर जो समाचार आ रहे हैं, उनमें हजारों लोग मुंह पर रूमाल या कपड़े का मास्क लगाये दिखते हैं। कई तरह के छोटे, बड़े और सुंदर डिजायनों वाले मास्क भी बाजार में खूब बिकने लगे हैं। धुंध से बड़ी संख्या में सड़क दुर्घटनाएं हो रही हैं। रेलगाड़ियां अत्यधिक देरी से चल रही हैं। हवाई सेवाएं भी प्रभावित हुई हैं। अतः सरकारी कामकाज भी ढीला पड़ गया है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अपनी पुरानी आदत के अनुसार इसका दोष हरियाणा और पंजाब की सरकारों पर मढ़ दिया है। उनका कहना है कि वहां के किसान खेत में पड़ी पराली को जला रहे हैं। इससे भारी धुआं पैदा हो रहा है, जो दिल्ली और आसपास तक आकर यहां के लोगों का जीना दूभर कर रहा है। चौराहे के सिपाही तथा दुकानदार सबसे अधिक परेशान हैं। वे जाएं तो जाएं कहां ? 

केजरीवाल साहब का कहना है कि इन राज्यों की सरकारों को चाहिए कि वे इस पराली को खरीद लें; पर अत्यधिक बुद्धिमान इस महापुरुष ने कभी खेती तो की नहीं। वे गेहूं और धान में या ईख और बाजरे की फसल में अंतर नहीं कर सकते। इसलिए उन्हें पता ही नहीं कि यह पराली दो-चार नहीं करोड़ों टन होती है। कोई सरकार इसे नहीं खरीद सकती। उनके बजट में इसका प्रावधान ही नहीं होता। और यदि खरीद भी ले, तो वह इसे रखेगी कहां और इसका होगा क्या ?

कुछ लोग विदेशी तर्ज पर दिल्ली में हैलिकॉप्टर से पानी छिड़कने की सलाह दे रहे हैं, तो कुछ का कहना है कि चार-छह दिन में यह धुआं स्वयं ही समाप्त हो जाएगा। ऐसा होते ही एक साल के लिए यह शोर भी दब जाएगा। दिल्ली सरकार ने फिर कुछ दिन के लिए निजी कारों को सम-विषम संख्या के अनुसार चलाने का आदेश दिया है। सब लोग चिंतित तो हैं; पर वे इस समस्या के मूल में जाना नहीं चाहते। यदि इस पर ध्यान दें, तो केवल धुंध ही नहीं, और भी कई समस्याओं का समाधान हो सकता है। 

भारत को गांव और खेती प्रधान देश माना जाता है; पर पिछले कुछ सालों से खेती के प्रति लोगों का रुझान घट रहा है। किसानों के बच्चे भी अब गांव में रहना और खेती करना नहीं चाहते। हल चलाना, पशुओं की सानी करना और गोबर में हाथ डालना अब पिछड़ेपन का प्रतीक मान लिया गया है। अतः वे सब शहरों में रहकर कोई नौकरी करना चाहते हैं। परिवार भी छोटे हो रहे हैं। शिक्षा प्राप्त करना तो अच्छा है; पर यह शिक्षा हमें खेती और पशुपालन से दूर कर रही है, यह इसका दूसरा और खराब पहलू भी है।

भारत की खेती परम्परागत रूप से गोवंश पर आधारित थी। हर किसान के घर में उसकी जमीन के अनुपात में गाय, बैल आदि होते ही थे। इससे जहां उसके परिवार को ताजा दूध और घी मिलता था, वहां बैल खेती के काम आते थे। गोमूत्र, गोबर और खेत की खर-पतवार आदि से उत्तम खाद और कीटनाशक बनते थे। इससे खेती सस्ती पड़ती थी तथा घर का हर प्राणी स्वस्थ और व्यस्त रहता था। गोवंश घर के सदस्य की भांति ही रहते और पलते थे। खेत से उनके लिए ताजा चारा आ जाता था। गेहूं, दाल, चावल, फल आदि मनुष्य खाते थे, तो उनकी घासफूस और छिलकों से पशुओं का पेट भर जाता था। इस प्रकार सब एक-दूसरे पर आश्रित थे। कोई चीज व्यर्थ नहीं जाती थी। अतः पर्यावरण का संरक्षण होता था।

पर अब परिदृश्य काफी बदल गया है। छोटे परिवार और युवा वर्ग की उदासीनता के कारण खेती करने वाले हाथ लगातार घट रहे हैं; पर गांव में खेती की जमीन तो उतनी ही है। अतः लोग मजबूरी में पशुओं की बजाय मशीन आधारित खेती की ओर झुक रहे हैं। अब जुताई, बुआई और कटाई के लिए टैªक्टर तथा डीजल से चलने वाले हार्वेस्टर आदि यंत्र आ गये हैं। छोटे किसान भी अब एक-दो दिन के लिए किराये पर इन्हें लेकर ही काम चला रहे हैं। इनसे जहां एक ओर प्रदूषण लगातार बढ़ रहा है, वहां खेती भी महंगी होती जा रही है। तेल के लिए विदेशों पर निर्भरता इसका एक अन्य पहलू है। 

पहले गेहूं, धान आदि का अवशिष्ट (पराली) पशुओं के खाने के काम आता था; पर अब पशुओं के अभाव में किसानों के सामने समस्या है कि वे इसे कहां ले जाएं ? उन्हें अगली फसल के लिए खेत खाली और फिर तैयार करना है। हाथ से कटाई करने पर पौधा नीचे जड़ के पास से काटा जाता है; लेकिन मशीनों से कटाई होने पर लगभग एक फुट अवशेष खेत में ही रह जाता है। उससे निबटने का उन्हें एक ही रास्ता नजर आता है और वह है इसे जलाना। आजकल पंजाब, हरियाणा आदि के हर गांव में पराली जल रही है। इससे ही दिल्ली और आसपास धुंध के बादल छाए हैं।

हमारे देश के कई अति शिक्षित और विदेशी डिग्रीधारी कृषि पंडित इस समस्या का समाधान भी दुनिया के दूसरे देशों की तर्ज पर ही करना चाहते हैं; पर हर आदमी को हर मर्ज में एक ही गोली देने से काम नहीं चलता। ऐसे ही विदेशी प्रणाली से भारत की समस्या का समाधान नहीं होगा। हमें तो अपने तरीके से ही इससे निबटना होगा; और इसका निदान गोवंश आधारित खेती ही है। इससे पराली जलने की बजाय फिर से पशुओं के पेट में जाएगी। अतः धुंध से छुटकारा मिलेगा। विदेशी तेल, बीज और कीटनाशक आदि पर निर्भरता कम होगी तथा जैविक खाद से खेत भी उर्वर होंगे। 

किसी विद्वान ने कहा है, ‘‘एके साधे सब सधे, सब साधे सब जाये।’’ अर्थात ठीक से समझ-बूझकर यदि एक को साध लिया, तो सब ठीक हो जाता है; पर यदि बिना सोचे-समझे सबको साधने का प्रयास किया, तो कुछ भी हाथ नहीं आता। अतः भारत को फिर से गोवंश आधारित खेती की ओर लौटने की आवश्यकता है। इससे ही सबका कल्याण होगा।

शुक्रवार, 20 अक्तूबर 2017

रोहिंग्या मुसलमान : समस्या और समाधान

रोहिंग्या मुसलमान इन दिनों केवल भारत ही नहीं, तो बंगलादेश के लिए भी सिरदर्द बन गये हैं। ये लोग मूलतः बंगलादेशी ही हैं, जो बर्मा के सीमावर्ती क्षेत्र में रहते हैं। काम-धंधे के लिए बर्मा आते-जाते हुए हजारों परिवार वहां के अराकान या रखाइन क्षेत्र में बस गये, जो आज लाखों हो गये हैं। 

आज तो भारत, बंगलादेश और बर्मा अलग-अलग देश हैं; पर 1935 तक भारत, बर्मा और श्रीलंका का एक ही गर्वनर जनरल (वायसराय) होता था। ब्रिटिश संसद ने ‘गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935’ से इन्हें अलग किया; पर लम्बे समय से वहां रहने के बावजूद बर्मा इन्हें अपना नागरिक नहीं मानकर अब निकाल रहा है। इसी से यह संकट उत्पन्न हुआ है। इसका कारण ये है कि कबीलाई जीवन होने के कारण हिंसा, लड़कियां उठाना और दूसरों के धर्मस्थल तोड़ना इनकी स्वाभाविक वृत्ति है।  

बर्मा एक बौद्ध देश है। बौद्ध समुदाय अहिंसक और शांतिप्रिय है। काफी समय से वे लोग इनके उपद्रव सह रहे थे; पर जब पानी सिर से ऊपर हो गया, तो उन्हें लगा कि अब भी यदि चुप रहे, तो हम अपने देश में ही अल्पसंख्यक हो जाएंगे। फिर हमारी दशा ऐसी ही होगी, जैसी बंगलादेश और पाकिस्तान में हिन्दुओं की है। अतः कुछ लोग शस्त्र लेकर इनं पर पिल पड़े। इनके नेता हैं मांडले के बौद्ध भिक्षु आशिन विराथु। वे पिछले 15 साल से इसमें लगे हैं। यद्यपि इसके लिए उन्हें 25 साल की सजा भी हुई; पर जनता के दबाव में सरकार को इन्हें सात साल बाद ही छोड़ना पड़ा। बाहर आकर ये फिर उसी काम में लग गये हैं।

पांचजन्य 1.10.2017 के अनुसार द्वितीय विश्व युद्ध में ब्रिटेन ने रोहिंग्याओं को जापान के विरुद्ध लड़ने को शस्त्र दिये थे। उन्होंने कहा कि जीतने पर वे रोहिंग्याओं के लिए एक अलग मुस्लिम देश बना देंगे; लेकिन शस्त्र पाकर वे हिन्दुओं और बौद्धों का संहार करने लगे। केवल एक ही दिन (28.3.1942) में उन्होंने 20 हजार बौद्धों को मार डाला। हत्या और हिंसा का यह तांडव आगे भी चलता रहा। 

1946 में स्वतंत्र होते ही बर्मा की सेना ने इनके विरुद्ध कार्यवाही कर इनकी कमर तोड़ दी। अतः ये शांत हो गये; पर 1971 में बंगलादेश बनने पर कई आतंकी समूह बनाकर ये फिर सक्रिय हो गयेे। दुनिया के अधिकांश मुस्लिम देशों ने इन्हें समर्थन और पड़ोसी बंगलादेश ने इन्हें शस्त्र दिये। इस प्रकरण के बाद आशिन विराथु सक्रिय हुए। 28.5.2012 को एक बौद्ध महिला के बलात्कार एवं हत्या से पूरा देश भड़क उठा और फिर हर बौद्ध विराथु का समर्थक बन गया।

बर्मा की राष्ट्रपति आंग सान सू की नोबेल विजेता एवं मानवाधिकारवादी हैं; पर बर्मा का जमीनी सच देखकर उन्होंने भी रोहिंग्याओं को कहा है कि वे या तो शांति से रहें या कोई दूसरा देश देख लें। बर्मा में सेना को अनेक शासकीय अधिकार भी हैं। उनकी इच्छा के बिना संसद कुछ नहीं कर सकती। सेना रोहिंग्याओं को सबक सिखाना चाहती है। अतः वह इन्हें खदेड़ रही है। इससे ये यहां-वहां भाग रहे हैं। बंगलादेश के मूल नागरिक और वहां रिश्तेदारी होने से अधिकांश लोग वहीं जा रहे हैं। कुछ समुद्री मार्ग से सऊदी अरब, यू.ए.ई. पाकिस्तान, थाइलैंड, मलयेशिया, इंडोनेशिया आदि में भी गये हैं। भारत में इनकी संख्या 40,000 से चार लाख तक कही जाती है। 

भारत में जो रोहिंग्या हैं, वे हर जगह अपने स्वभाव के अनुसार आसपास की खाली सरकारी जगह घेरकर मस्जिद और मदरसे आदि बना रहे हैं। हर दम्पति के पास छह-सात बच्चे भी हैं। अतः उनके आवास के पास गंदगी रहती है। सघन बस्तियों में उन्होंने कुछ दुकानें भी बना ली हैं। कुछ लोग मजदूरी आदि करने लगे हैं। इससे जहां एक ओर भारतीय संसाधनों पर बोझ बढ़ रहा है, वहां वे भारतीयों का रोजगार भी छीन रहे हैं। अर्थात जो स्थिति बंगलादेशी घुसपैठियों की है, वही क्रमशः इनकी हो रही है। अतः विस्फोटक होने से पहले ही समस्या सुलझानी होगी।

लेकिन ये हो कैसे ? सर्वप्रथम तो दुनिया के सब मुस्लिम देश अपने मजहबी भाइयों को गले लगायें। वे दो-चार हजार करके इन्हें आपस में बांट लें। भारत उन्हें वहां तक पहुंचा दे। या फिर ये सब हिन्दू या बौद्ध हो जाएं। भारत एक हिन्दू देश है। बौद्ध मत भी विशाल हिन्दू धर्म का ही अंग है। इससे भारतीयों की स्वाभाविक सहानुभूति उन्हें मिलेगी। मंदिर जाने से उनकी हिंसा और उग्रता घटेेगी। 20-30 साल में वे अपने कुसंस्कारों से मुक्त हो जाएंगे। दिल्ली में कुछ रोहिंग्या चर्च का आर्थिक और सामाजिक सहयोग पाने को ईसाई हो गये हैं। जब वे ईसाई हो सकते हैं, तो अपने पुरखों के पवित्र हिन्दू धर्म में भी आ सकते हैं। 

दूसरा रास्ता उन्हें निकालने का है। यह बात कई केन्द्रीय मंत्रियों ने कही है; पर ये आसानी से तो जाएंगे नहीं। सरकार तो कई पार्टियों की बनीं; पर आज तक बंगलादेशी घुसपैठिये वापस नहीं भेजे गये। जो बात तब सच थी, वो आज भी सच है। इसलिए सेक्यूलरों के शोर पर ध्यान न देकर सख्ती करनी होगी। भारत सरकार इन्हें पकड़कर सौ-सौ के समूह में नौकाओं में बैठा दे। मानवता के नाते साथ में कुछ दिन का खाना, पानी और बच्चों के लिए दूध आदि रखकर इन्हें भारतीय समुद्री सीमा के पार छोड़ दिया जाए। फिर जहां इनकी किस्मत इन्हें ले जाए, ये वहीं चले जाएं।

सोमवार, 16 अक्तूबर 2017

रोहिंग्या शरणार्थी और सद्गुण विकृति

इन दिनों भारत में चर्चा गरम है कि बर्मा से आये रोहिंग्याओं को शरण दें या नहीं ? कुछ सेक्यूलरवादी पुरोधा इसके समर्थन में न्यायालय में भी गये हैं। इनका तर्क है कि भारत में सदा से ही शरणागत के संरक्षण की परम्परा रही है। अतः इस बार भी इसका पालन होना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय ने भी फिलहाल इन्हें निकालने पर रोक लगा दी है।

भारतीय धार्मिक साहित्य में राजा शिबि की कथा आती है। कहते हैं कि एक बार वे दरबार में बैठे थे कि एक भयभीत कबूतर आकर उनकी गोद में छिप गया। उसके पीछे एक बाज भी आ गया। बाज ने राजा से कबूतर वापस मांगा। राजा ने यह कहकर मनाकर दिया कि शरणागत की रक्षा मेरा धर्म है। बाज ने कहा कि कबूतर उसका आहार है और उसका आहार छीनना भी अधर्म है। राजा ने उसे किसी और पशु-पक्षी का मांस देना चाहा, तो बाज ने कहा कि कबूतर को बचाने के लिए किसी और को मारना भी तो अधर्म ही है।

राजा बड़े असमंजस में पड़ गया। अंततः सहमति इस पर हुई कि वह कबूतर के भार के बराबर अपना मांस दे दे। अतः तराजू के एक पलड़े में कबूतर और दूसरे में राजा अपना मांस रखने लगा; पर आधे से अधिक शरीर का मांस चढ़ने पर भी कबूतर वाला पलड़ा नीचे रहा। अतः राजा स्वयं पलड़े में बैठ गये। ऐसा होते ही पलड़ा झुक गया। आकाश से फूल बरसने लगे। कबूतर और बाज भी अपने असली रूप में आ गये। वे राजा की परीक्षा लेने आये इंद्र और अग्निदेव थे। ऐसी ही कथा श्रीराम के पूर्वज राजा दिलीप की भी है, जिन्होंने नंदिनी गाय की रक्षा के लिए सिंह के सामने स्वयं को प्रस्तुत कर दिया था। 

शरणागत की रक्षा के कुछ ताजे प्रसंग और भी हैं। दो अक्तूबर 1996 को ग्राम सामतसर (चुरू, राजस्थान) के निहालचन्द बिश्नोई ने शिकारियों की गोली से घायल एक शरणागत हिरण की प्राणरक्षा में अपनी जान दे दी। 1999 में राष्ट्रपति महोदय ने उन्हें मरणोपरान्त ‘शौर्य चक्र’ से सम्मानित किया। जनसत्ता 1.5.2004 के अनुसार जिला जैसलमेर, राजस्थान के हरिसिंह राजपुरोहित ने शिकारियों से तीतर को बचाने के लिए अपने प्राण दे दिये। इंडिया टुडे 6.6.2005 के अनुसार जिला सुरेन्द्रनगर (गुजरात) के मुली कस्बे में गत 600 साल से वीर सोधा परमारों की याद में मेला होता है। यहां शरणागत घायल तीतर की रक्षार्थ सोधा और चाबड़ों में युद्ध हुआ था। इसमें 200 सोधा और 400 चाबड़ मारे गये थे। 

ये प्रसंग बताते हैं कि भारत में शरणागत की रक्षा की सुदीर्घ परम्परा है; पर इसका पालन विदेशी और विधर्मी के साथ करें या नहीं, यह भी विचारणीय है। क्योंकि यहां प्रश्न देश-रक्षा का भी है, जिसके सामने निजी प्रतिज्ञा या सम्मान बहुत छोटी चीज है। पहले देश, बाद में सब कुछ; पर कुछ लोगों ने देश और धर्म की बजाय निजी, जातीय या क्षेत्रीय सम्मान को महत्व दिया, जिससे आगे चलकर बहुत हानि हुई। वीर सावरकर ने इसे ही ‘सद्गुण विकृति’ कहा है। राजस्थान के इतिहास में ऐसे कई उदाहरण हैं।

पंडित चंद्रशेखर पाठक कृत ‘पृथ्वीराज’ के अनुसार गजनी का सुल्तान मोहम्मद गौरी और उसका चचेरा भाई मीर हुसेन दोनों एक वेश्या ‘चित्ररेखा’ के आशिक थे। मीर हुसेन इसे भगाकर भारत ले आया। उसकी याचना पर नागौर में शिकार खेल रहे पृथ्वीराज ने उसे शरण दे दी। साथ ही हिसार और हांसी की जागीर देकर उसे दरबार में अपने दाहिने हाथ की ओर बैठने का सम्मान भी दिया। पता लगने पर मो. गौरी ने इन्हें वापस मांगा; पर शरणागत रक्षक पृथ्वीराज नहीं माने। इसका दुष्परिणाम क्या हुआ, यह सबको पता है। कहते हैं कि पृथ्वीराज और गौरी के बैर का यही मुख्य कारण था।

पृथ्वीराज चौहान के वंशज और रणथंभौर के शासक हमीरदेव ने भी अलाउद्दीन खिलजी के एक विद्रोही सेनानायक मीर मोहम्मद शाह और उसके कुछ साथियों को शरण दी थी। शाह कुछ समय पहले ही मुसलमान बना था तथा अलाउद्दीन से उसके मतभेद का कारण गुजरात की लूट का बंटवारा था। इस कारण अलाउद्दीन और हमीरदेव में युद्ध हुआ। हमीरदेव, उनका पूरा परिवार, सेना और राज्य बलि चढ़ गया; पर वे पीछे नहीं हटे। तभी से ये कहावत प्रसिद्ध है - 

सिंह गमन, सत्पुरुष वचन, कदली फले इक बार
तिरया तेल, हमीर हठ, चढ़े न दूजी बार।

मेड़ता के शासक राव जयमल एक समय अकबर के मित्र थे। कई युद्धों में दोनों ने एक-दूसरे का साथ दिया; पर जब जयमल ने अकबर के एक विद्रोही सेनापति सर्फुद्दीन को शरण दी, तो उनके संबंध बिगड़ गये। अतः अकबर ने मेड़ता पर हमलाकर जयमल को भागने पर मजबूर कर दिया। जयमल को मेवाड़ के महाराणा उदयसिंह ने शरण देकर बदनौर की जागीर प्रदान की। इससे अकबर मेवाड़ पर चढ़ गया। इस युद्ध में अकबर की सेना से लड़ते हुए जयमल मारा गया। उसके पुत्र कुंवर शार्दूल सिंह ने भी सर्फुद्दीन की रक्षा में वीरगति पायी, जब वह उसे नागौर से मेड़ता ला रहा था। कहते हैं, तभी से अकबर के मन में मेवाड़ राज्य के प्रति स्थायी शत्रुता के बीज पड़े। यह संघर्ष आगे महाराणा प्रताप के काल में भी जारी रहा।

इन प्रसंगों का निष्कर्ष बस इतना ही है कि यदि हिन्दू राजाओं ने शरण देते समय विदेशी और विधर्मियों की मानसिकता का ध्यान रखा होता, तो उन्हें और भारत को इतने दुर्दिन नहीं देखने पड़ते। ‘‘लम्हों ने खता की और सदियों ने सजा पायी..’’ ऐसी ही गलतियों के लिए कहा गया है।

यद्यपि भारत में शरण और भी कई समुदायों ने ली है। अपनी पुण्यभूमि छूटने के बाद यहूदी दुनिया भर में भटके। हर जगह उन्हें ठोकरें मिलीं। अपवाद रहा तो बस भारत। यहां उन्हें शरण भी मिली और प्रेम भी; पर वे यहां रच-बस गये। अतः संख्या में बहुत कम होते हुए भी उनका योगदान सराहनीय है। 1971 युद्ध के एक नायक जनरल जैकब यहूदी ही थे।

यही इतिहास पारसियों का है। जब वे विस्थापित होकर भारत आये, तो उनका भी स्वागत हुआ। वे यहां दूध में शक्कर जैसे घुलमिल गये। अतः मानेकशा, टाटा, नरीमन, सोहराबजी, गोदरेज आदि सैकड़ों नाम आज भारत के गौरव हैं। दलाई लामा के नेतृत्व में तिब्बती, श्रीलंका से तमिल और बंगलादेश से चकमा बौद्ध भी शरणार्थी होकर भारत आये हैं; पर इनके कारण भारत को कभी समस्या नहीं हुई।

लेकिन शरणार्थी के नाम पर बंगलादेश से आये मुस्लिम घुसपैठियों को देखें। ये हमारा रोजगार छीन रहे हैं तथा जहां भी हैं, वहां कानून-व्यवस्था के लिए समस्या बने हैं। दिल्ली और उसके आसपास सम्पन्न घरों में सफाई आदि करने वाली मुन्नी, चुन्नी, बबली, बेबी, सोना, गुड्डी आदि नामधारी लाखों महिलाएं बंगलादेशी हैं। वे खुद को बंगलादेश से लगे बिहार के पूर्णिया जिले की कहती हैं। पूर्णिया में बंगला आसानी से बोली और समझी जाती है; पर उनके पति, बच्चों और निवास आदि के बारे में थोड़ा गहराई से पूछें, तो असलियत पता लग जाती है। पुरुष मजदूरी और रिक्शाचालन, तो बच्चे कूड़ा-संग्रह और चोरी-उठाईगीरी में लगे हैं। वोट के लालची नेताओं ने उनके वोट, आधार और राशन कार्ड बनवा दिये हैं। इससे वे यहां के नागरिक हो गये हैं। गत 12 जुलाई, 2017 को नौएडा की ‘महागुण सोसायटी’ में घरेलू कामगार महिला के साथियों द्वारा किया गया पथराव किसी से छिपा नहीं है।

इस संदर्भ में रोहिंग्या मुसलमानों पर विचार करें। आज उनकी संख्या 40 हजार हो या चार लाख; पर कल जब वे बंगलादेशियों की तरह यहां जम जाएंगे, तब क्या होगा ? अतः निष्कर्ष स्पष्ट है कि इन्हें शरण देना भारत के वर्तमान और भविष्य दोनों के लिए घातक है।

रविवार, 8 अक्तूबर 2017

अपने-अपने महामानव

यों तो महामानव किसी धर्म, जाति या क्षेत्र के नहीं होते, भले ही उन्होंने काम इनमें से किसी एक के लिए ही किया हो। प्रायः शासक अपने या अपने परिजनों के नाम पर सार्वजनिक योजनाओं के नाम रखते हैं। ये लोग वर्तमान भी हो सकते हैं और दिवंगत भी। देवी-देवताओं के नाम पर भी नगर या गांवों के नामकरण की लम्बी परम्परा है। राम और कृष्ण के नाम पर भारत ही नहीं, विदेशों में भी हजारों नगर हैं।

जब भारत में इस्लाम के हमले शुरू हुए, तो कुछ हमलावरों को भारत पंसद आ गया। अतः वे यहीं जम गये। उन्होंने कुछ क्षेत्रों पर अधिकार कर वहां शासन भी किया। यद्यपि उनके विरुद्ध भारतीय सदा लड़ते रहे। अतः ये तथाकथित बादशाह कभी चैन नहीं ले सके। ऐसा लगभग 800 साल तक चला। इस दौरान उन्होंने कुछ नये नगर बसाये, तो हजारों गांव और नगर बरबाद भी किये। आज भारत में हैदराबाद और अहमदाबाद से लेकर गाजियाबाद और फैजाबाद जैसे सैकड़ों नगर हमले और अत्याचारों की जीवित दास्तान हैं।

यही परम्परा अंग्रेजी काल में भी रही। उन्होंने पर्वतीय पर्यटन स्थलों पर ‘माल रोड’ और हर नगर में ‘विक्टोरिया पार्क’ बनाये। उन दिनों माल रोड पर शाम को केवल अंग्रेजों और उनके कुत्तों को घूमने का अधिकार था। उस समय भारतीयों का प्रवेश वहां वर्जित था। यद्यपि उनका जोर विध्वंस या नाम बदल की बजाय नये स्थान विकसित कर उन्हें लैंसडौन, डलहौजी और मांटगुमरी आदि अंग्रेजी नाम देने पर अधिक रहा। आजादी मिलने पर इनमें से कई नाम बदल दिये गये। सभी विक्टोरिया पार्क ‘गांधी पार्क’ हो गये; पर इस्लामी हमलावरों द्वारा दिये गये नाम नहीं बदले गये। इसके पीछे जवाहर लाल नेहरू की दूषित मानसिकता तथा वोट बैंक की राजनीति प्रमुख कारण है। 

अंग्रेजों के जाने के बाद नामकरण का केन्द्र गांधी और नेहरू हो गये। शायद ही कोई नगर हो, जहां गांधी रोड या नेहरू कालोनी न हो। फिर यह धारा फिरोज परिवार की ओर मुड़ गयी। अतः इंदिरा मार्केट, संजय, राजीव और सोनिया विहार बन गये। एक विशेष बात यह भी है कि प्रायः बेतरतीब और बिना नक्शे के बनी अवैध बस्तियों को ये नाम दिये गये, जिससे कांग्रेस शासन में उन्हें कोई छू न सके। धीरे-धीरे वोट बैंक के लालच में नेता वहां आने लगते हैं। वे उन्हें बिजली और पानी दिलवाते हैं। इस प्रकार वह बस्ती वैध हो जाती है। दिल्ली जैसे बड़े शहरों में तो चुनाव में अवैध बस्तियों को वैध करवाना एक बड़ा मुद्दा होता है।

लेकिन सत्ता तो सदा किसी के पास नहीं रहती। इसलिए विद्वानों ने उसे वारंगना अर्थात वेश्या कहा है। सत्ता बदलते ही नेताओं के नाम पर बनी योजनाओं के नाम भी बदलने लगते हैं। उ.प्र. में मायावती, कल्याण सिंह और मुलायम सिंह के राज में कई बार जिलों के नाम बदले गये थे। इससे प्रशासन और जनता को कितनी परेशानी हुई, इससे नेताओं को कोई मतलब नहीं होता। वे तो अपने खेमे के नाम रखकर खुद को या शीर्ष नेतृत्व को खुश करना चाहते हैं।

इसीलिए स.पा. सरकार में आचार्य नरेन्द्र देव, डा. राममनोहर लोहिया और जनेश्वर मिश्र को महत्व मिलता है, तो मायावती सरकार में डा. अम्बेडकर, काशीराम, ज्योतिबा फुले, गौतम बुद्ध और महामाया जैसी विभूतियों को। भा.ज.पा. वाले डा. मुखर्जी, दीनदयाल उपाध्याय, कुशाभाऊ ठाकरे और अटल बिहारी वाजपेयी के नाम पर योजनाओं के नाम रखते हैं। भा.ज.पा. वाले जानते हैं कि उनकी शक्ति का मूल स्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ है। अतः कुछ सड़कों, अस्पतालों या योजनाओं में केशव और माधव जैसे नाम भी जुड़ जाते हैं।

सच तो यह है कि इनमें से अधिकांश महामानवों ने अपने समय में देश, धर्म और समाज की भरपूर सेवा की है। अतः इनमें से किसी के भी अवदान को नकारा नहीं जा सकता; पर जब इनके साथ राजनीति जुड़ जाती है, तो स्वाभाविक रूप से दूसरा खेमा विरोध करने लगता है। इसलिए संस्था या योजना के नामकरण में निष्पक्ष और राष्ट्रीय दृष्टि अपनानी चाहिए। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि वह नेता निर्विवाद हो तथा उसके साथ नरसंहार, विध्वंस, हत्या, चारित्रिक दोष, सत्ता लोलुपता, भ्रष्टाचार, वंशवाद या तानाशाही जैसे अपराध न जुड़े हों। 

इस पर एक और तरह से भी विचार करना चाहिए। जिस क्षेत्र, नगर या गांव में कोई स्कूल, बांध, सड़क या कालोनी बन रही है, उसे किसी स्थानीय लेखक, पत्रकार, वीर सैनिक, स्वाधीनता सेनानी, लोकतंत्र सेनानी, कलाकार, संत या समाजसेवी के नाम पर समर्पित करें। इससे उस क्षेत्र के लोग गौरवान्वित होंगे तथा नयी पीढ़ी उनके बारे में जानकर उन जैसा बनने का प्रयास करेगी। इससे सरकार बदलने पर नाम बदलने का दबाव भी नहीं होगा। एक महामानव के नाम पर किसी एक बड़ी योजना का नाम रख देना पर्याप्त है। हर जगह उसी का नाम हो, इसका कोई औचित्य नहीं है।

देहरादून की सैन्य अकादमी में एक प्रमुख भवन ‘परमवीर अरुण खेत्रपाल’ के नाम पर है। पासिंग आउट परेड के समय उसमें प्रवेश करते ही हर सैनिक का सिर गर्व से ऊंचा हो जाता है। ऐसे ही सियाचिन में ‘परमवीर बाना सिंह’ के नाम पर ‘बाना पोस्ट’ है। देश भर में ऐसे सैकड़ों गांव और नगर हैं, जहां ऐसे वीर सैनिकों के नाम पर द्वार, स्कूल, सड़क और चैराहों के नाम रखे गये हैं। यह प्रयास सराहनीय है। इसी सोच पर यदि काम हो, तो किसी को आपत्ति नहीं होगी।

लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि क्या राजनेता इस पर विचार करेंगे ? 

शुक्रवार, 29 सितंबर 2017

बुलेट रेलगाड़ी योजना

पिछले दिनों नरेन्द्र मोदी ने जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ मिलकर अमदाबाद में ‘बुलेट रेलगाड़ी योजना’ का शिलान्यास किया। कहा गया है कि पांच साल में ये पटरियों पर चलने लगेगी। अमदाबाद से मुंबई जाने वाले यात्रियों को इससे बहुत सुविधा होगी। उनका समय बचेगा। सुबह जाकर वे शाम को लौट सकेंगे। इससे कारोबार आसान होगा। रेलगाड़ी के मार्ग पर नये नगर और व्यापार केन्द्र बनेंगे। इस प्रकल्प में लगने वाला खरबों रुपया जापान बहुत कम ब्याज पर दे रहा है। इसलिए आज की तारीख में तो इस योजना पर भारत का खर्च शून्य है। रेलगाड़ी के साथ जापान इसकी तकनीक भी देगा। इसी प्रकार के अनेक तर्क इसके पक्षधर दे रहे हैं।

दूसरी ओर इसके विरोधी भी हैं। उनका कहना है कि इतने सालों बाद भी हमारी रेलगाड़ियां समय से नहीं चलती। हर महीने कोई न कोई दुर्घटना भी हो जाती है। हजारों फाटक मानवरहित हैं। वहां हर समय दुर्घटना का खतरा बना रहता है। स्टेशन और रेलगाड़ियों में सफाई का बुरा हाल है। ए.सी. में चलने वाले यात्री गंदे बिस्तर प्रयोग करने को मजबूर हैं। महंगा होने के बावजूद भोजन अच्छा नहीं मिलता। चोरी के भय से यात्री ठीक से सो भी नहीं सकते। धनाभाव में स्थायी कर्मचारियों की बजाय ठेके पर काम कराने का प्रचलन बढ़ रहा है। अतः सर्वत्र अव्यवस्था फैली है।

ऐसे लोगों का कहना है कि पहले इसे ही ठीक करना चाहिए। इनमें हर दिन करोड़ों लोग यात्रा करते हैं, जबकि बुलेट रेलगाड़ी में तो वही चलेंगे, जो आज भी हवाई जहाज से यात्रा कर लेते हैं। इसलिए बुलेट रेलगाड़ी से कुछ लाभ नहीं होगा। हां, इसका कर्ज आगामी सरकार और जनता को लम्बे समय तक चुकाना होगा। इतने धन से देश के हर चार-छह गांवों के बीच एक अच्छा विद्यालय और चिकित्सालय बन सकता है। इससे गांवों से पलायन रुकेगा और शहरों पर दबाव कम होगा।

थोड़ा गंभीरता से सोचें, तो दोनों पक्षों के तर्क कुछ-कुछ ठीक लगते हैं। आकाश में उड़ने वाले को भी धरती पर नजर रखना जरूरी है। अन्यथा वह नीचे गिर कर हाथ-पैर तुड़ा बैठता है। कहते हैं कि सिंह छलांग लगाने के बाद एक क्षण के लिए पीछे मुड़कर देखता है कि छलांग कैसी रही ? इसे ही ‘सिंहावलोकन’ कहते हैं। आगे और पीछे, दोनों तरफ बराबर ध्यान देने के कारण ही शेर जंगल का निर्विवाद राजा है। 

तो बुलेट रेलगाड़ी के बारे में विचार करते समय कुछ अन्य संदर्भ समझने हांेगे। विकास सम्बन्धी हर काम के समय आधारभूत ढांचे के निर्माण में मोटा खर्च होता है। इस आधार पर कई लोग उसका विरोध भी करते हैं; लेकिन योजना पूरी होने पर पता लगता है कि वह प्रारम्भिक खर्च कितना जरूरी था ?

मैं यहां देहरादून का उदाहरण दूंगा। 30 साल पहले शहर से काफी दूर जौलीग्रांट गांव में एक हवाई अड्डा बना। कई साल तक वहां दिन भर में 40 सीट वाला एक छोटा विमान दिल्ली से आकर आधे घंटे बाद लौट जाता था। बाकी दिन भर हवाई अड्डे की सड़क पर लोग वाहन चलाने का अभ्यास करते थे। बच्चे भी वहां खेलते थे। कई लोगों ने उसका यह कह कर विरोध किया कि केवल 40-50 लोगों की सुविधा के लिए हुआ करोड़ों रु. का यह खर्च अपव्यय है; पर आज उसी हवाई अड्डे पर हर घंटे विमान आते-जाते हैं। अब उसका और विस्तार हो रहा है, जिससे बड़े विमान भी उतर सकें।

इसी क्रम में मुझे अपने नगर में बनी पानी की सरकारी टंकी याद आती है। उन दिनों हर घर और गली में हत्थू नल थे। इसलिए टंकी बनने पर मुश्किल से सौ घरों ने कनैक्शन लिये। कई लोगों ने उस पर हुए लाखों रु. के खर्च का विरोध किया। कुछ लोग हत्थू नल के पानी को ताजा और टंकी के पानी को बासी कहते थे; पर आज वहां हर मोहल्ले में टंकी है और हत्थू नल गायब हो गये हैं। 

अर्थात किसी भी आधारभूत निर्माण पर हुए खर्च की उपयोगिता बाद में ही ठीक से पता लगती है। रेल और बस स्टेशन से लेकर स्कूल और कॉलिज तक यह सच है। आज जितने बड़े-बड़े विश्वविद्यालय हैं, उनमें से अधिकांश पाठशालाओं के रूप में ही शुरू हुए थे। देहरादून में महादेवी कन्या पाठशाला को सौ साल से अधिक हो गये। आज वहां पी-एच.डी. तक की पढ़ाई होती है; पर नाम उसका पाठशाला ही है। 

अंतरिक्ष योजनाओं से जहां एक ओर हमारी सुरक्षा मजबूत हुई है, वहां दूसरे देशों के उपग्रह प्रक्षेपित कर हम पैसे भी कमा रहे हैं। 30-40 साल पहले राकेट विज्ञानी डा.सतीश धवन या डा. कलाम के अलावा इतनी दूर की कौन सोचता था ? तब तो लोग इसे बेकार का खर्च कहते थे। आज हम मंगल पर पहुंच गये हैं और चांद पर मानव भेजने की तैयारी कर रहे हैं। चंद्रमा पर पहला कदम रखने के बाद अमरीकी अंतरिक्ष यात्री नील आर्मस्ट्रांग ने उस छोटे कदम को मानव जाति और विज्ञान के इतिहास में बड़ी छलांग कहा था। उनका यह कथन सनातन सत्य है।

इसका एक दूसरा पक्ष भी है। कई बार ऐसी योजनाओं से जो तकनीक मिलती है, उसका अन्य क्षेत्रों में भी उपयोग होता है। द्वितीय विश्व युद्ध में अणु बम ने बहुत विध्वंस किया; पर उस शक्ति से आज दुनिया के अरबों घर जगमगा रहे हैं। इंटरनेट का उपयोग आज मोबाइल फोन से लेकर घर, दुकान, विद्यालय और चिकित्सा तक में हो रहा है। यहां तक तो इसके आविष्कर्ताओं ने भी नहीं सोचा होगा। जब राजीव गांधी और सैम पित्रोदा कम्प्यूटर लाये, तो यह कहकर उसका विरोध हुआ कि यह करोड़ों नौकरियां खा जाएगा; पर आज कोई कार्यालय इसके बिना नहीं चलता। आधार कार्ड के विरोधी ही अब उसका पक्ष ले रहे हैं। विज्ञान जगत में ऐसे हजारों उदाहरण हैं। 

अर्थात कोई भी तकनीक बुरी नहीं है; पर उसका उपयोग कहां और किसलिए हो रहा है, यह महत्वपूर्ण है। जिस बारूद से बम बनते हैं, वह पहाड़ में सड़क और पुल निर्माण में भी काम आता है। इसीलिए भारतीय प्राचीन परम्परा में विभिन्न घातक अस्त्र देने से पहले गुरु शिष्य की शारीरिक ही नहीं, मानसिक परीक्षा भी लेते थे। क्योंकि इनकी कोई काट नहीं थी। इन्हें वापस भी नहीं बुला सकते थे। अतः महाविनाश निश्चित था। ब्रह्मास्त्र, पाशुपतास्त्र आदि ऐसे ही अस्त्र थे।

इसलिए बुलेट रेलगाड़ी का विरोध तो उचित नहीं है; पर इस तकनीक का उपयोग हम अपनी घरेलू रेल व्यवस्था को सुधारने में कैसे कर सकते हैं, इस पर अभी से विचार जरूरी है। क्योंकि भारत का आम आदमी तो अपने गांव और नगर से गुजरने वाली छुक-छुक गाड़ी में ही यात्रा करता है। बुलेट रेलगाड़ी में बैठने लायक जब वह होगा, तब देखेंगे; पर अभी तो वर्तमान रेल यात्रियों की सहज और सुरक्षित यात्रा ही प्राथमिकता पर है।

40 साल के बाद प्रायः लोग चश्मा लगाने लगते हैं। कई लोगों के चश्मे ‘बाइफोकल’ होते हैं। अर्थात उनमें पास और दूर वाले दो लैंस होते हैं। व्यक्ति दोनों का ही प्रयोग करता है। इसी तरह देश की योजनाओं में पास और दूर, अर्थात आज और कल, दोनों का सम्यक चिंतन होना चाहिए। बुलेट रेलगाड़ी की योजना ठीक है; पर उसके कारण आम आदमी की रेलगाड़ी न छूट जाए। भविष्य के चक्कर में वर्तमान न बिगड़े, यह देखना भी जरूरी है।

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

कूड़ाघर बनता भारत

दिल्ली से उ.प्र. की सीमा में प्रवेश करते समय गाजियाबाद से कुछ पहले, सीधे हाथ पर गाजीपुर में बना कूड़े का पहाड़ सबको दिखता है। इतना ही नहीं दुर्गंध के कारण वह महसूस भी होता है। उड़ती हुई चीलें, कौए और कूड़े के पहाड़ में से अपने काम की चीजें तलाशते बच्चे वहां हर दिन ही दिखायी देते हैं। ये बच्चे ऐसी चीजें बटोरते हैं, जो कबाड़ी के पास बिक सकें। प्रायः ये बच्चे नंगे हाथ-पैर, केवल कच्छा और बनियान पहने इस खतरनाक काम में लगे रहते हैं। 

इस कचरे के सड़ने से गैस बनती है, उससे बचने को वहां से गुजरने वाले अपनी कार के शीशे चढ़ा लेते हैं। बस, पैदल या अन्य यात्री नाक पर हाथ रख लेते हैं। इसके बाद वे दिल्ली सरकार या गाजियाबाद नगर निगम और उ.प्र. की सरकार पर लानत भेजते हैं। कूड़ा बटोरने वाले निर्धन और अनाथ बच्चे वहीं बैठकर बीड़ी-सिगरेट पीते हैं। इससे उस कूड़े के ढेर में कई बार आग लग जाती है। 

अखबारों में यह कई बार छपा कि इसकी ऊंचाई लगातार बढ़ते हुए अपनी निर्धारित सीमा से बहुत आगे निकल गयी है। ऐसे में कभी भी कोई दुर्घटना हो सकती है; पर किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया। पिछले एक सितम्बर को यह कूड़े का पहाड़ गिर गया। कुछ लोग इसमें दब कर मर गये। कुछ वाहन कूड़े के धक्के से पास की नहर में जा गिरे। इससे दिल्ली और अन्य नगरों का कूड़ा और इसका निस्तारण चर्चा का विषय बन गया।

सच तो यह है कि कूड़ा आज हर नगर के लिए एक बड़ी समस्या बन चुका है। इसका मुख्य कारण हमारी वर्तमान जीवन शैली है। पहले विवाह के दहेज में सिलाई मशीन अनिवार्य चीज थी। जीवन में सादगी थी। अतः महिलाएं घर पर ही बड़ों के पुराने कपड़ों से बच्चों के छोटे कपड़े बना लेती थीं। कुछ कपड़ों को जोड़-तोड़ कर बच्चों के बस्ते तथा बाजार से सामान लाने के थैले बन जाते थे। दोपहर की गप्प गोष्ठी में पड़ोसी महिलाओं से नये डिजाइन मिल जाते थे; पर अब वह समय टी.वी. और मोबाइल ने छीन लिया है। अतः अब हर चीज रैडिमेड है। 

पैकिंग में प्लास्टिक का उपयोग बढ़ रहा है। यद्यपि प्लास्टिक ने जीवन को सरल बनाया है। उसके कारण करोड़ों पेड़ कटने से बचे हैं; पर सिक्के का दूसरा पहलू ये भी है कि ये नष्ट नहीं होता और इसके कारण किसी चीज के बार-बार उपयोग की आदत समाप्त हो गयी है। परिणाम है हर गली में लगा कूड़े का ढेर।

यद्यपि समय की घड़ी उल्टी नहीं घुमायी जा सकती; लेकिन ‘पुरानी नींव नये निर्माण’ की तर्ज पर कहीं न कहीं संतुलन जरूर बनाना पड़ेगा। नहीं तो कूड़े जैसी बेकार लगने वाली चीज ही समस्या बन जाएगी। इन दिनों कूड़े से सड़क और पैट्रोल आदि बनाने की बात प्रायः सुनने और पढ़ने में आती है; पर ये प्रयोग अभी सर्वव्यापी नहीं हो सके। अर्थात किसी न किसी स्तर पर ये अव्यावहारिक हैं। इसलिए कूड़े के निस्तारण का कुछ और ही उपाय सोचना होगा।

घरों से कूड़ा एकत्र करने के लिए प्रायः सभी नगरों में कूड़ा गाड़ियां घूमती हैं। वे इसके लिए कुछ शुल्क वसूलती हैं। फिर वे यह कूड़ा शहर से कहीं दूर डाल देती हैं; पर जहां भी ये कूड़ा डलता है, वहां के लोग इसका विरोध करते हैं। क्योंकि कुछ ही दिन में वहां कुत्ते, बिल्ली, चूहे, कौए और चील जैसे मांसाहारी जीवों का डेरा लगने लगता है। कूड़े की दुर्गंध और उससे होने वाले रोग भी परेशान करते हैं। 

गली या मोहल्ले में जहां सरकारी कूड़ेदान रखे जाते हैं, वहां का भी बुरा हाल हो जाता है। यद्यपि जैविक (फल और सब्जी के छिलके, बासी भोजन, घास, पत्ते जैसे गीले) और अजैविक (बोतल, कपड़ा, धातु की चीजें, धूल, मिट्टी जैसे सूखे कूड़े) के लिए अलग कूड़ेदान होते हैं; पर लोगों का स्वभाव उन्हें अलग रखने का नहीं है। वे घर से प्लास्टिक की थैलियों में सारा कूड़ा एक साथ लाते हैं। फिर उसे बाजार या दफ्तर जाते समय उनमें से किसी में भी फेंक देते हैं। प्रायः वे इसके लिए स्कूटर या कार से उतरते भी नहीं हैं। भूमिगत कूड़ेदानों के मुंह पर भी कूड़ा बिखरा रहता है।

कुछ देशों में प्रशासन लोगों को कई रंग की बड़ी थैलियां देता है। उसमें लोग कूड़े को अलग-अलग रखकर निर्धारित दिन आने वाली कूड़ागाड़ी में डालते हैं। भारत में भी ऐसी व्यवस्था बनी है; पर हम अपनी आदत से मजबूर हैं। वस्तुतः आजादी के बाद हमें अपने अधिकार तो बताये गये; पर कर्तव्यों की चर्चा नहीं हुई। राजनेताओं ने कहा कि तुम हमें वोट दो और पांच साल के लिए सो जाओ। इसीलिए सब ओर अव्यवस्था दिखायी देती है। कूड़े की समस्या भी उनमें से एक है।

इसलिए यदि कूड़े से बचना है, तो यथासंभव मूल स्थान पर ही इसे निबटाना होगा। केन्द्रीकरण हर समस्या का निदान नहीं है। इस नाम पर हम अपनी समस्या आगे खिसका देते हैं। घरेलू कूड़ा गली में, गली का मोहल्ले में और वहां का नगर निगम से होकर गाजीपुर जैसे कूड़ापहाड़ में। इसलिए सबसे पहली बात तो ये है कि कूड़ा निकले ही कम। अतः बार-बार प्रयोग होने वाली चीजें काम में लाने की आदत डालनी होगी। कपड़े का थैला इसका सबसे अच्छा उदाहरण हैं। यदि घर पर न भी बने, तो बाजार में कपड़े या जूट के थैले मिलते हैं, जो कई महीने तक चल जाते हैं।

फल, सब्जी, बासी भोजन, किचन गार्डन या क्यारी की बेकार घास, पत्ते, फूल, गाय या भैंस जैसे दुधारु पशु के मल और मूत्र आदि से घर में ही जैविक खाद बना सकते हैं। कोलतार जैसे ड्रम के आकार वाले इसके यंत्र अब बनने लगे हैं। इससे रसोई के लिए उपयोगी गैस भी मिलती है। जहां बिजली नहीं है, वहां इससे प्रकाश भी कर सकते हैं। इस संयंत्र के प्रयोग के लिए जन जागरण के साथ ही कुछ सख्ती भी होनी चाहिए। इसके कारोबार में भी काफी गुंजाइश है। यदि कोई व्यापारी बुद्धि का युवा इस ओर ध्यान दे, तो कुछ साल में ही हर नगर में केबल की तार और डिश टी.वी. जैसा इसका भी संजाल फैल सकता है। इससे बिजली और रसोई गैस का खर्च बचेगा और कूड़े से भी मुक्ति मिलेगी। यानि एक पंथ कई काज।

आजकल बड़ी संख्या में बहुमंजिला कालोनी और अपार्टमेंट बन रहे हैं। इसकी अनुमति देते समय शासन यह देखे कि वहां के कूड़े का वहीं निस्तारण हो। जब वहां बिजली, पानी, पार्क, तरणताल, क्लब, सुरक्षा आदि की व्यवस्था होती है, तो कूड़े की भी हो सकती है। सभी फैक्ट्रियों, विद्यालयों, धार्मिक स्थलों आदि पर भी ये नियम लागू हों। अर्थात विकेन्द्रीकरण से इस समस्या के समाधान में सहयोग होगा।

नरेन्द्र मोदी द्वारा चलाये गये ‘स्वच्छता अभियान’ का असर अभी बहुत कम है। ये तभी सफल होगा, जब हमारे दिमाग साफ होंगे। अतः कूड़े के प्रति हमें अपना दृष्टिकोण बदलना होगा। तभी गाजीपुर जैसी दुर्घटनाएं बंद हो सकेंगी।

सोमवार, 4 सितंबर 2017

पैसे और परिवार में संतुलन जरूरी

इन दिनों मीडिया में इंटरनेट के माध्यम से स्मार्ट फोन या कम्प्यूटर पर खेले जाने वाले खेल ‘ब्लू व्हेल’ की बहुत चर्चा हो रही है। इस खेल ने अब तक भारत में कई बच्चों की जान ले ली है। विदेश के आंकड़े उपलब्ध नहीं है; पर निःसंदेह वहां यह संख्या कुछ अधिक ही होगी। इसके स्वरूप के आधार पर इसे खेल कहना बिल्कुल अनुचित है। फिर भी इसने सब बच्चों के अभिभावकों को चिंतित जरूर कर दिया है।

इस हिंसक खेल में बच्चों को 50 दिन में 50 कठिन काम करने होते हैं। इन्हें करते हुए वह अपनी बांह पर कुछ निशान लगाता है। इससे धीरे-धीरे वहां व्हेल मछली का चित्र बनने लगता है। इसका अंतिम काम आत्महत्या है। छोटे और भोले बच्चे क्रमशः इसके जाल में फंसते हुए अंततः आत्महत्या कर लेते हैं। सुना है कि भारत और अन्य कई देशों ने इसे प्रतिबंधित कर दिया है तथा इसके रूसी निर्माता को गिरफ्तार कर लिया है।

ये खेल तो शायद आज या कल बंद हो जाए; पर ऐसा कोई दूसरा खेल फिर शुरू नहीं होगा, इसकी कोई गारंटी नहीं है; पर इसकी चर्चा से जिस समस्या की ओर लोगों का ध्यान गया है, वह है बच्चों का अकेलापन। यह कैसे हो सकता है कि घर में मां-बाप और भाई-बहिनों के रहते हुए भी किसी को ये पता न लगे कि बच्चे के मन में क्या चल रहा है ? इसका अर्थ है समस्या कहीं और है।

असल में पिछले 25-30 साल में हमारे समाज में कई परिवर्तन  हुए हैं। सम्पन्नता बढ़ी है तथा शहरीकरण की अति के चलते संयुक्त परिवार टूटे हैं। कैरियर के चक्कर में विवाह देर से होने लगे हैं। तलाक भी खूब होने लगे हैं। पति-पत्नी दोनों के कामकाजी होने से बच्चों की संख्या घटी है। शिक्षा, विवाह और चिकित्सा महंगे हुए हैं। मोबाइल जैसे उपकरण सर्वसुलभ हुए हैं; पर इनसे जहां अनेक सुविधाएं मिली हैं, तो अकेलापन, अवसाद, रक्तचाप, मधुमेह जैसे रोग भी तेजी से बढ़े हैं। यह इस सिक्के का दूसरा पहलू है। इसी की चरम परिणिति आत्महत्या है। 

आजकल समाज में मोटा पैसा कमाने वाले ही सफल माने जाते हैं। भले ही वे सही-गलत कुछ भी करें। जनसंख्या तो बढ़ी है; पर कम्प्यूटर के कारण नौकरियां घटी हैं। अतः उनके लिए मारामारी अधिक है। किसानों के बच्चे भी अब खेती करना नहीं चाहते। महीने में कई लाख रु. कमाने वाले व्यापारियों के बच्चे भी एक लाख रु. की नौकरी के पीछे भाग रहे हैं। नौकरी की इस होड़ के चलते हर बड़े शहर में कैरियर संस्थान खुल गये हैं, जहां बच्चों को सफलता के शिखर पर पहुंचाने का दावा किया जाता है; पर हर बच्चा तो वहां नहीं पहुंच सकता। परिणाम वही शारीरिक और मानसिक रोग।

इसे विचारों का पीढ़ीगत अंतर भी कह सकते हैं; पर क्या यह सच नहीं है कि 25-30 साल पहले लोग अभावों के बावजूद अधिक सुखी थे। तब अवसाद, रक्तचाप, मधुमेह या आत्महत्या जैसे रोग बहुत कम थे। क्योंकि व्यक्ति के जीवन में परिवार का महत्व था। लोग आपस में खूब बातें करते थे, जबकि अब महत्व केवल पैसे का है। समस्या की जड़ यही है।

आज से 30-40 साल पहले तक परिवार प्रायः संयुक्त तथा हर दम्पति के चार-पांच बच्चे भी होते थे; पर अब सम्पन्नता के बावजूद यह संख्या कहीं दो से आगे नहीं है। कुछ लोग ये कहकर एक से ही संतोष कर ले रहे हैं कि इसे ही ठीक से पढ़ा लें। पता नहीं ये कहां और कैसी नौकरी करेगा ? ऐसे में यदि पैसा पास में होगा, तभी बुढ़ापा ठीक से कटेगा। इसलिए लोग आज के साथ ही कल के लिए भी भरपूर पैसा बचा लेना चाहते हैं। यद्यपि जनसंख्या की अति का समर्थन नहीं किया जा सकता; पर इसकी कमी भी ठीक नहीं है। 

संयुक्त और मध्यम आकार के परिवार के कई लाभ थे। छोटी-मोटी बीमारी दादी के नुस्खों से ही ठीक हो जाती थीं। महिलाएं घर या बाहर कहीं व्यस्त हैं, तो बुजुर्गों के संरक्षण में बच्चे सुरक्षित रहकर खेलते या पढ़ते रहते थे। बड़े बच्चे भी छोटों को संभाल लेते थे। इस तरह संयुक्त परिवार सेफ्टी वाल्व का काम करते थे; पर इनके अभाव में बच्चे हों या बड़े, सब टी.वी., मोबाइल या कम्प्यूटर की शरण में हैं। 

फेसबुक के निर्माता और दुनिया के शीर्ष धनपति मार्क जुकरबर्ग के अनुसार उसके अभिभावकों ने 12 साल का होने तक उसे कम्प्यूटर नहीं दिया और वह भी अपने बच्चों के साथ यही करेगा। ऐसा कहने वाले जुकरबर्ग की बुद्धिमत्ता पर संदेह का कोई कारण नहीं है। पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने अपने दूसरे कार्यकाल के लिए वोट मांगते समय अमरीकी परिवार बचाने के लिए प्रयास करने का वायदा किया था। स्पष्ट है कि परिवार का महत्व अब विदेशी भी समझ रहे हैं।

महिलाएं नौकरी करें या नहीं, और करें तो कब करें, इस पर मतभिन्नता हो सकती है; पर प्रकृति ने उन्हें संतानोत्पत्ति और उनके पालन की विशेष जिम्मेदारी दी है, जिसे पुरुष नहीं कर सकते। इसकी उपेक्षा घातक हो सकती है। इन दिनों पुरुष भी काफी व्यस्त हो गये हैं। बड़े शहरों में आने-जाने में ही कई घंटे लग जाते हैं। पहले बाजार में साप्ताहिक बंदी होती थी। बच्चे इसकी प्रतीक्षा करते थे, जिससे पिता के साथ समय बिता सकें; पर सरकार चाहती है कि पश्चिमी देशों की तरह बाजार सातों दिन और 24 घंटे खुलें। इससे व्यापार, बिजली का खर्च और रात्रिकालीन अपराध कितने बढ़ेंगे, ये तो पता नहीं; पर परिवार जरूर बरबाद हो जाएंगे। यहां हमें अमरीका की बजाय भूटान का अनुसरण करना होगा, जहां प्रगति का आधार ‘खुशहाली इंडैक्स’ को बनाया गया है।

पैसे और परिवार का ये संघर्ष हमारे समाज की नयी परिघटना है। इसमें कौन जीतेगा, ये कहना कठिन है। लोग कोल्हू के बैल बनकर बच्चों के लिए पैसा कमाते हैं; पर इस चक्कर में उनकी आपस में कई दिन तक बात ही नहीं होती। बुजुर्ग तो जैसे-तैसे समय गुजार लेते हैं; पर बच्चे इस अकेलेपन को नहीं झेल पाते। ऐसे में उनका साथी बनता है कम्प्यूटर, मोबाइल और ‘ब्लू व्हेल’ जैसे घातक खेल।

मेरे पड़ोस में कई कोचिंग केन्द्र हैं। वहां दिन भर भीड़ लगी रहती है। युवाओं को देखकर अच्छा लगता है; पर जब एक दुपहिये पर तीन (और कभी-कभी चार) लड़के-लड़कियां अशालीन कपड़ों में फंसे दिखते हैं, तो आंखें झुक जाती हैं। सिगरेट पीना वहां आम बात है। शनिवार की शाम, गली की आड़ में प्रायः पीना-पिलाना और इससे आगे भी बहुत कुछ हो जाता है। ऐसे में कुछ कहना भी खतरे से खाली नहीं है।

गांव और छोटे नगरों के हजारों युवा कोचिंग के लिए कमरे किराये पर लेकर या छात्रावासों में रहते हैं। अभिभावक सोचते हैं कि हम उन्हें पढ़ाकर अपना कर्तव्य निभा रहे हैं; पर उन्हें पता ही नहीं लगता कि उनके बच्चे किससे दोस्ती कर रहे हैं ? इसमें से ही ‘लव जेहाद’ जैसी दुर्घटनाएं भी हो रही हैं, जिससे प्रायः साम्प्रदायिक तनाव और दंगे हो जाते हैं।

यद्यपि कैरियर और पैसे के महत्व को नकारा नहीं जा सकता; पर इन दोनों में संतुलन जरूरी है। ऐसा न हो कि जिनके लिए पैसा कमा रहे हैं, वे ही हाथ से निकल जाएं। तब सिर पकड़कर यही कहना होगा, ‘‘न खुदा ही मिला न बिसाले सनम; न इधर के रहे न उधर के रहे।’’

इस संतुलन के लिए समाजशास्त्री कुछ सूत्र बताते हैं। इनके सपरिवार पालन से किसके मन में क्या चल रहा है, ये पता लगेगा। कोई समस्या होगी, तो ‘ब्लू व्हेल’ जैसे विस्फोट से पहले ही उसका समाधान हो जाएगा। ये सूत्र हैं - 1. रात का भोजन 2. अपने इष्ट की साप्ताहिक पूजा 3. मासिक मनोरंजन 4. वार्षिक तीर्थयात्रा।

कई लोगों ने इनके प्रयोग से घर की खुशियां बढ़ाई हैं। आप भी करके देखें।

गुरुवार, 31 अगस्त 2017

कैसी और कितनी उच्च शिक्षा

शिक्षा पर बात करने का हक यों तो शिक्षाविदों को ही है; पर कभी-कभी कुछ ऐसी घटनाएं या दुर्घटनाएं हो जाती हैं, जो बाकी लोगों को भी सोचने को बाध्य कर देती हैं। पिछले दिनों खतौली नामक एक छोटे नगर में भीषण रेल दुर्घटना हुई। यह नगर दिल्ली से देहरादून मार्ग पर उ.प्र. के मुजफ्फरनगर जिले में गंग नहर के किनारे स्थित है। ‘चीतल’ नामक प्रसिद्ध खानपान केन्द्र ने बस या कार से आने-जाने वाले यात्रियों और पर्यटकों के बीच खतौली को अच्छी पहचान दिलायी है। 

गत 19 अगस्त, 2017 को यहां हरिद्वार जा रही ‘उत्कल एक्सप्रेस’ के 14 डिब्बे पटरी से उतर गये। दुर्घटना इतनी भीषण थी कि कई डिब्बे एक-दूसरे पर चढ़ गये। 23 लोगों की अकाल मृत्यु हुई और सैकड़ों घायल हुए। स्टेशन और नगर के पास होने से यात्रियों को चिकित्सा सुविधा शीघ्र मिल गयी, अन्यथा मृतकों की संख्या और अधिक होती। 

दुर्घटना के बाद जांच के दौरान दो लोगों की फोन पर हुई वार्ता अखबारों में छपी है। उनमें से एक उस समय खतौली के रेलवे फाटक पर तैनात कर्मचारी था, तो दूसरा कोई पूर्व कर्मचारी। वार्ता का निष्कर्ष यह था कि लाइन पर कार्यरत गैंगमैन कुछ देर काम करके फिर कमरे में आराम करने लगते हैं। बेरोजगारी के कारण इस काम में अब उच्च शिक्षित युवा भी आ रहे हैं, जबकि खराब पटरी के नट-बोल्ट खोलना, उसे काटना और जोड़ना साधारण सा काम है। इसे कम शिक्षा और सामान्य प्रशिक्षण प्राप्त लोग भी कर सकते हैं। अब तक ऐसा ही होता था; पर उच्च शिक्षित लोग धूप या वर्षा में अधिक परिश्रम नहीं कर पाते। अतः निर्धारित समय में पटरी की मरम्मत नहीं हो सकी। दुर्घटना के कई कारणों में से एक ये भी है। 

यह प्रसंग हमें शिक्षा व्यवस्था पर पुनर्विचार करने का अवसर देता है। शिक्षा प्रगति का द्वार है। अतः आजादी के बाद शिक्षा विस्तार पर बहुत जोर दिया गया; पर शिक्षा कैसी और कहां तक हो, इस पर ध्यान नहीं दिया। अतः प्राथमिक शिक्षा उपेक्षित हो गयी। पिछली केन्द्र सरकार ने तो शिक्षितों के आंकड़े बढ़ाने के लिए कक्षा आठ तक परीक्षा ही बंद कर दी। यह अनुभव सभी का है कि सरकारी अध्यापक दुर्गम क्षेत्र में जाना नहीं चाहते। कई जगह तो सब अध्यापक मिलकर सप्ताह में दो-दो दिन बांट लेते हैं, बाकी पांच दिन छुट्टी। या फिर वे उस गांव के ही किसी शिक्षित बेरोजगार युवक को पांच-सात हजार पर नियुक्त कर देते हैं। वह उनकी जगह बच्चों को घेर कर बैठा रहता है। परीक्षा न होने से पढ़ाने का दबाव भी नहीं रहा। अतः प्राथमिक शिक्षा चौपट हो गयी। 

पिछले दिनों कई राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने ग्रामीण विद्यालयों की जांच की। उन्होंने देखा कि कक्षा आठ के बच्चे कक्षा दो या तीन की पुस्तक भी नहीं पढ़ पाते। दोपहर भोजन योजना की लाभ-हानि भी विचारणीय है। सर्वव्यापी भ्रष्टाचार तो इसमें है ही; पर कई अध्यापक पढ़ाने की बजाय इसी में लगे रहते हैं। इसके साथ ही उन्हें और भी कई सरकारी काम करने होते हैं। अतः जो पढ़ाना चाहते हैं, वे भी मजबूर हैं कि कब और कैसे पढ़ायें ?

यहां से निकले छात्रों को जब हाई स्कूल और इंटर की बोर्ड परीक्षा देनी पड़ती है, तो उनके हाथ-पैर फूल जाते हैं। अतः वे नकल का सहारा लेते हैं। प्रायः इस घपले में उनके अभिभावक, विद्यालय के प्राचार्य और प्रबंधक भी शामिल रहते हैं। अभिभावक चाहते हैं कि बच्चे पास हो जाएं, जिससे उनके विवाह में सुविधा हो तथा कोई सरकारी नौकरी मिल जाए। प्राचार्य और प्रबंधक विद्यालय का अच्छा परिणाम चाहते हैं, जिससे उन्हें सरकारी सहायता मिलती रहे। इस दुष्चक्र में शिक्षा बर्बाद हो रही है।

इसके साथ ही शासन ने दूर-दूर तक लाखों डिग्री कॉलिज खोल दिये हैं। इनकी संख्या लगातार बढ़ रही है। इनमें स्नातक और उससे आगे की पढ़ाई होती है। यहां से भी बड़ी संख्या में डिग्रियां बंट रही हैं। शिक्षा के निजीकरण से लाखों अयोग्य युवा अपने मां-बाप के पैसे के बलपर बी.टेक, एम.टेक, एम.बी.ए, एम.सी.ए. जैसी व्यावसायिक डिग्रियां पा लेते हैं; पर इससे जहां एक ओर वे अपनी पुश्तैनी खेती या कारोबार से कट जाते हैं, वहां योग्यता के अभाव में उन्हें कोई ढंग की नौकरी भी नहीं मिलती। अतः वे त्रिशंकु की तरह बीच में लटक जाते हैं। 

सम्पन्न घरों के लोग तो दो-चार साल धक्के खाकर कारोबार में लग जाते हैं; पर बाकी युवा मजबूरी में गैंगमैन, फिटर, माली या चपरासी जैसी नौकरी स्वीकार कर लेते हैं, जहां के लिए निर्धारित योग्यता दसवीं या बारहवीं ही है। आजकल सरकारी नौकरियों में वेतन तो बहुत अच्छे हैं; पर कम्प्यूटर के कारण नौकरियां घटी भी हैं। शासन भी इन कामों में पक्की नौकरी की बजाय ठेकेदारी प्रथा को प्रश्रय दे रहा है। ठेकेदार के पास नौकरी मिलने पर भी उन तथाकथित शिक्षित युवाओं के सिर पर तलवार लटकी रहती है। अतः वे पूरे मन से काम नहीं कर पाते और सदा किसी अच्छे और स्थायी काम की तलाश में भटकते रहते हैं। सामाजिक प्रतिष्ठा धूमिल होने के भय से वे घर से दूर रहना पसंद करते हैं। अतः वे गांव और परिवार से भी कट जाते हैं। उच्च शिक्षा के बावजूद ढंग का काम न होने से उनके विवाह में देरी होती है। अतः कई युवा नशे और अवसाद में फंसकर आत्महत्या जैसा घातक कदम भी उठा लेते हैं।

शिक्षा बहुत जरूरी है; पर उच्च शिक्षा कितनी और कहां तक हो ? बिना योग्यता के ही ऊंची डिग्री लेकर सड़क पर धक्के खाते युवाओं की फौज से देश का कितना भला होगा, यह सोचना भी जरूरी है। इस बारे में भारत तथा अमरीका में छात्र एवं प्राध्यापक रहे गाजियाबाद (उ.प्र.) निवासी अभियंता, वैज्ञानिक एवं उद्योगपति स्वर्गीय डा. जगमोहन जी जापान का उदाहरण देते थे। वहां 15-16 साल तक हर बच्चे को शिक्षा प्राप्त करना जरूरी है। उसके बाद उतने बच्चों को ही आगे पढ़ने दिया जाता है, जितनों की देश को जरूरत है। बाकी को हाथ के काम सिखाये जाते हैं, जिससे वे अपने घर में ही कोई छोटा उद्योग लगा सकें या फिर किसी बड़े उद्योग में अपनी योग्यता एवं प्रशिक्षण के अनुरूप नौकरी पा सकें। इसी के बल पर द्वितीय विश्व युद्ध में पूरी तरह नष्ट होने के बाद भी जापान 50 साल तक दुनिया के इलैक्ट्रोनिक बाजार में राजा बना रहा। अब इन्हीं कारणों से यह स्थान चीन ले रहा है।

भारत के संदर्भ में सोचें, तो हाई स्कूल स्तर तक की शिक्षा हर जाति, वर्ग, लिंग या क्षेत्र के बच्चे के लिए अनिवार्य हो। संक्षेप में कहें, तो यह डा. राममनोहर लोहिया के चार सूत्रों (अनिवार्य, निकट, समान और मातृभाषा में शिक्षा) पर आधारित हो। फिर शिक्षा का स्तर जैसे-जैसे ऊंचा हो, पढ़ने वालों की संख्या क्रमशः नियन्त्रित होती जाए। आखिर हाई स्कूल या इंटर में 50 प्रतिशत अंक पाने वाले छात्र एम.ए. या पी.एच-डी. के बाद भी अपना या देश का क्या भला कर सकेंगे ?

इसलिए प्राथमिक से लेकर हाई स्कूल स्तर तक के विद्यालय इतनी संख्या में हों कि सभी बच्चे अपने घर से आसानी से पहुंच सकें। इसके बाद के विद्यालय क्रमशः न्याय पंचायत, विकास खंड, तहसील और जिला केन्द्रों पर हों। विद्यालय के साथ ही लड़के और लड़कियों के लिए अलग छात्रावास भी हों, जिससे वे ठीक से पढ़ सकें। यहां क्षेत्र की जनसंख्या और विद्यालयों की संख्या में उचित संतुलन जरूरी है। 

यह सच है कि शिक्षा से ही प्रगति के द्वार और बुद्धि के कपाट खुलते हैं; पर उच्च शिक्षा किसे, कितनी और कहां तक मिले, इस पर भी विचार होना चाहिए। शिक्षित युवा देश की रीढ़ हैं। इसीलिए शिक्षा विभाग की गणना मानव संसाधन मंत्रालय के अन्तर्गत की जाती है; पर नौकरी के इच्छुक युवाओं की तरह वे लोग भी मानव ही हैं, जो रेल दुर्घटनाओं में मर या घायल हो रहे हैं। इसका कारण कहीं अनावश्यक और अत्यधिक उच्च शिक्षा तो नहीं है ?

खतौली और उसके बाद दस ही दिन में हुई चार रेल दुर्घटनाएं इस विषय की समीक्षा की मांग कर रही हैं।

बुधवार, 3 मई 2017

विपक्षी एकता की (अ)संभावनाएं

विपक्षी एकता की खिचड़ी पकाने के प्रयास फिर से हो रहे हैं। 1947 के बाद केन्द्र और राज्यों में प्रायः कांग्रेस का ही वर्चस्व रहता था। विपक्ष के नाम पर कुछ जनसंघी, तो कुछ वामपंथी ही सदनों में होते थे। 1967 में डा. राममनोहर लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय के प्रयास से पहली बार यह खिचड़ी पकी और उत्तर भारत के कई राज्यों में कांग्रेस विरोधी दलों की संयुक्त सरकारें बनीं। तबसे ही विपक्षी एकता की बात चल पड़ी।

लेकिन तबसे गंगा-यमुना में न जाने कितना पानी बह चुका है। 1975 के आपातकाल में इंदिरा गांधी ने विपक्ष के अधिकांश तथा अपनी पार्टी के भी कुछ विद्रोही नेताओं को जेल में बंद कर दिया। वहां इन नेताओं के पास कुछ काम नहीं था। यह भी पता नहीं था कि बाहर निकलेंगे या नहीं ? ऐेसे में फिर से दिल मिलने लगे। कहते भी हैं कि दुख मिलाता है और सुख दूर करता है। अतः विपक्षी एकता की खिचड़ी फिर पकने लगी। इस बार इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की बड़ी महत्वपूर्ण भूमिका थी।

इंदिरा गांधी ने सत्ता को सदा अपने परिवार की चेरी बनाये रखने के लिए देश में तानाशाही थोपी थी; पर इसके साथ उसने संघ पर भी प्रतिबंध लगा दिया। संघ प्रत्यक्ष राजनीति तो नहीं करता; पर स्वयंसेवक उन दिनों प्रायः ‘भारतीय जनसंघ’ में सक्रिय थे, जो धीरे-धीरे कांग्रेस का स्थान ले रहा था। इंदिरा गांधी को उसकी धूर्त मंडली ने कहा कि जहां से जनसंघ को शक्ति मिल रही है, उस संघ को कुचल दो। इंदिरा गांधी ने यही किया; पर प्रतिबंध और लोकतंत्र की हत्या के विरोध में संघ ने देश भर में जन जागरण एवं सत्याग्रह किया। संघ के वरिष्ठ कार्यकर्ता प्रो. राजेन्द्र सिंह (रज्जू भैया) छद्म वेष में जेल में बंद नेताओं से मिले और उन्हें साथ आने को कहा। अधिकांश नेता भयभीत थे; लेकिन 1977 में चुनाव घोषित होने पर उन्होंने साहस जुटाया और फिर जो हुआ, वह इतिहास में लिखा है।

इस विपक्षी एकता के नाम पर ‘जनता पार्टी’ बनी। इसमें परदे के पीछे संघ और परदे के आगे श्री जयप्रकाश नारायण की बड़ी भूमिका थी। लोकसभा चुनाव में जनता पार्टी की जीत के बाद मोरारजी देसाई प्रधानमंत्री बने। जनसंघ को भी कुछ मंत्रीपद मिले। यद्यपि उनके काम और त्याग के हिसाब से ये कम थे। जेल में सर्वाधिक लोग संघ-जनसंघ के ही थे; पर विपक्षी एकता बनाये रखने के लिए वे चुप रहे। जयप्रकाश जी को राष्ट्रपति बनने का आग्रह किया गया; पर वे नहीं माने। संघ भी संगठन और सेवा के पुराने काम में लग गया। अर्थात विपक्षी एकता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले लोग स्वयं राजनीति से बाहर ही रहे। 

पर यह विपक्षी एकता शीघ्र ही बिखर गयी। चरणसिंह और जगजीवन राम लड़ने लगे कि मंत्रिमंडल में नंबर दो कौन है ? आखिर दोनों को उपप्रधानमंत्री बनाकर राजी किया गया। फिर राजनारायण, मधु लिमये, चंद्रशेखर जैसे समाजवादियों ने जनसंघ वालों पर दबाव डाला कि वे संघ से नाता तोड़ें। कुछ मूर्ख तो संघ को ही भंग करने को कहने लगे; पर जनसंघ वालों ने साफ कह दिया कि यह संबंध मां-बेटे जैसा अटूट है। इस पर पार्टी और सरकार में खूब तकरार हुई। 

इधर इंदिरा गांधी मौका ताक रही थी। उन्होंने सत्तालोलुप चरणसिंह को दाना डाला और उन्हें प्रधानमंत्री बनाकर सरकार गिरा दी। भारत में वही एकमात्र प्रधानमंत्री हैं, जो एक भी दिन संसद नहीं गये। इसके बाद फिर चुनाव हुए। जनता पार्टी टूट चुकी थी। जनसंघ घटक ने ‘भारतीय जनता पार्टी’ बना ली। इससे विपक्षी एकता की आत्मा नष्ट हो गयी। इंदिरा गांधी ने नारा दिया कि सत्ता उन्हें दें, जो सरकार चला सकें। अतः जनता ने उन्हें बहुमत दे दिया।

यह विपक्षी एकता क्यों नहीं चली ? एक तो इसमें अधिकांश सत्ता के भूखे कांग्रेसी और झगड़ालू समाजवादी थे। असली विपक्ष तो केवल जनसंघ ही था; पर ये लोग उसके ही पीछे पड़ गये। उन्हें डर था कि संघ के जमीनी काम से जनसंघी सब ओर छा जाएंगे और भविष्य में हमारे बच्चे मुंह ही ताकते रहेंगे। दूसरा नेताओं को कुरसी के लिए लड़ता देख जयप्रकाश जी उदासीन हो गये। अतः विपक्षी एकता की दुकान बंद हो गयी।

इसके बाद विपक्षी एकता का प्रयास विश्वनाथ प्रताप सिंह के समय में हुआ। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद 1984 में राजीव गांधी तीन चौथाई बहुमत से प्रधानमंत्री बने; पर वे बोफोर्स की दलाली में फंस गये। इस पर वी.पी.सिंह ने विद्रोह का झंडा उठा लिया। उनके पीछे एक बार फिर सारा विपक्ष आ गया। इस बार दलों के विलय की बजाय एक मोरचा बनाया गया। इसे सफलता मिली और 1989 में वी.पी.सिंह प्रधानमंत्री बन गये।

पर वी.पी.सिंह आते ही मुस्लिम तुष्टीकरण के गीत गाने लगे। इधर विश्व हिन्दू परिषद का श्रीराम मंदिर आंदोलन जोर पकड़ रहा था। उधर देवीलाल ने वी.पी.सिंह की नाक में दम कर रखा था। उससे छुटकारे के लिए वी.पी.सिंह ने मंडल कमीशन की धूल खा रही रिपोर्ट जारी कर दी। देश में आरक्षण विरोधी आग लग गयी; पर अपने ओ.बी.सी. वोट मजबूत होते देख वी.पी.सिंह खुश थे। मुस्लिम वोट के लिए उन्होंने श्रीरामरथ के यात्री लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया। इससे भा.ज.पा. ने समर्थन वापस ले लिया। अब कांग्रेस के बाहरी समर्थन से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने; पर कुछ समय बाद कांग्रेस ने हाथ खींच लिया। 1991 में हुए नये चुनावों के बीच ही राजीव गांधी की हत्या हो गयी। उस सहानुभूति के बल पर कांग्रेस एक बार फिर जीत गयी और नरसिंहराव प्रधानमंत्री बन गये। विपक्षी एकता की पतीली फिर चूल्हे से उतर गयी।

यहां भी बात वही थी कि विपक्षी एकता की बात करने वालों का असली उद्देश्य कांग्रेस को हटाना नहीं, बल्कि खुद प्रधानमंत्री बनना था; और ऐसे लोग कई थे। इसलिए कांग्रेस के हटते ही ये आपस में लड़ने लगते थे। 

कुछ ऐसा ही माहौल इस समय भी है। अब भा.ज.पा. और नरेन्द्र मोदी की दुंदुभि बज रही है। अतः इनके विरोध की हांडी चढ़ाने का प्रयास हो रहा है; पर क्या इनके पास नानाजी देशमुख और जयप्रकाश नारायण जैसे सत्ता को ठुकराने वाले लोग हैं ? क्या सबको जोड़ने में अदृश्य गोंद की भूमिका निभाने वाला संघ जैसा कोई सेवाभावी संगठन है ? परिदृश्य तो उल्टा ही है। मृतप्रायः कांग्रेस के मालिक राहुल बाबा प्रधानमंत्री पद पर अपना पुश्तैनी हक समझते हैं। उधर नीतीश कुमार बिहार की जीत से खुद को असली दावेदार मानने लगे हैं। दावा तो अरविंद केजरीवाल का भी था; पर इन दिनों उनकी झाड़ू ही टूट के कगार पर है।

कहते हैं कि राजनीति संभावनाओं का खेल है; पर अभी तो विपक्षी एकता का प्रयास असंभावनाओं का तमाशा ही लगता है।