शुक्रवार, 4 मई 2018

अलगाववादी जिन्ना के निर्माता


जिनका विश्वास भूत-प्रेत में नहीं हैं, वे अपनी मान्यता पर इन दिनों पुनर्विचार कर रहे हैं, क्योंकि मोहम्मद अली जिन्ना का भूत फिर जीवित हो गया है। यह भूत जैसे भारतीय जनता और पार्टियों को बांट रहा है, उससे लगता है कि जीवित रहते जिन्ना ने ही निश्चित रूप से भारत को बंटवाया होगा।

लेकिन विभाजन और लाखों निरपराध लोगों की हत्या के लिए जिन्ना के साथ ही गांधी भी बराबर के दोषी हैं। 1947 के बाद कांग्रेस ने जिन्ना को खलनायक बनाकर प्रस्तुत किया और नेहरू को नायक। आजादी की पहली वर्षगांठ से पहले ही गांधी जी विदा हो गये और कुछ समय बाद सरदार पटेल। बस फिर क्या था ? नियन्त्रणहीन नेहरू सब ओर छा गये। कांग्रेसियों ने सत्ता की रेवड़ियों के लालच में नेहरू को भगवान बना दिया। भारतीय धरती की सुगंध से घृणा करने वाले नेहरू ने जी भर कर देश को बर्बाद किया, शेष काम उनके वंशज कर रहे हैं। यदि नेहरू को सत्ता पाने की जल्दी न होती, और गांधी जी भी उस षड्यन्त्र में शामिल न होते, तो आजादी का संघर्ष भले ही दो-चार साल और खिंचता; पर हमें क्षत-विक्षत भारत मां नहीं मिलती। 

निःसंदेह किसी समय जिन्ना भारतभक्त थे। जिसने 1925 में सेंट्रल असेंबली में कहा था कि मैं भारतीय हूं, पहले भी, बाद में भी और अंत में भी; जो मुसलमानों का गोखले जैसा नरमपंथी नेता बनना चाहता था; जिसने खिलाफत आंदोलन को गांधी का पाखंड कहा; जिसने मुसलमानों के अलग मतदान और निर्वाचन क्षेत्रों का विरोध किया; जिसने राजनीति में मजहबी मिलावट के गांधी, मोहम्मद अली और आगा खान के प्रयासों का विरोध किया; जिसने तिलक के अपमान पर वायसराय विलिंगटन का मुंबई में रहना दूभर कर दिया; जिसने रंगीला रसूलके प्रकाशक महाशय राजपाल के हत्यारे अब्दुल कयूम की फांसी का समर्थन किया; जिसने लाहौर के शहीदगंज गुरुद्वारे के विवाद में सिखों की भरपूर सहायता की; 1933 में जिसने लंदन के रिट्ज होटल में पाकिस्तान शब्द के निर्माता चौधरी रहमत अली की हंसी उड़ाकर उसके भोज का बहिष्कार किया; कट्टरवादी मुल्लाओं को कातिल ए आजमऔर काफिर ए आजमकहा; 1934 में जिसने मुंबई के चुनाव में स्पष्ट कहा था कि मैं भारतीय पहले हूं, मुसलमान बाद में; जलियांवाला बाग कांड के बाद जो असेम्बली में गांधी और नेहरू से अधिक प्रखरता से बोला था; रोलेट एक्ट के विरोध में उसकी भूमिका से प्रभावित होकर गांधी ने उसे कायदे आजम (महान नेता) कहा और मुंबई में जिन्ना हाल बनाने की घोषणा की, 1938 तक जिसका रसोइया हिन्दू, कारचालक सिख, आशुलिपिक मलयाली ब्राह्मण, रक्षा अधिकारी गोरखा हिन्दू, जिसके अखबार का संपादक ईसाई और जिसका निजी डाक्टर पारसी था; वह जिन्ना पाकिस्तान का निर्माता कैसे बन गया, क्या यह प्रश्न विचारणीय नहीं है ?

इसके लिए भारत के मुसलमानों के साथ ही कांग्रेस की मानसिकता पर भी हमें विचार करना होगा। मुसलमानों ने कभी मौलाना आजाद को अपना नेता नहीं माना, जो पांचों समय के नमाजी और कट्टर मुसलमान थे। उन्होंने नेता माना मौलाना मोहम्मद अली और शौकत अली को, जो अलगाव की भाषा बोलते थे। कांग्रेस के काकीनाड़ा अधिवेशन का प्रसंग स्मरण करना यहां उचित होगा, जब उद्घाटन के समय हुए वन्दे मातरम् गान पर अध्यक्षता कर रहे मौहम्मद अली मंच से नीचे उतर गये थे। उनकी इस बदतमीजी को गांधी और कांग्रेस ने बर्दाश्त किया। क्या जिन्ना जैसा अत्यधिक सफल और महत्वाकांक्षी बैरिस्टर इस घटना से अनजान रहा होगा ?

जिन्ना ने समझ लिया कि यदि मुसलमानों का नेता बनना है, तो अलगाव की भाषा ही बोलनी होगी। उसने ऐसा किया और फिर वह मुसलमानों का एकछत्र नेता बन गया। यह भी सत्य है कि अंग्रेजों ने षड्यन्त्रपूर्वक जिन्ना को इस मार्ग पर लगाया, चूंकि वे गांधी के विरुद्ध किसी को अपने पक्ष में खड़ा करना चाहते थे। नमाज तक न जानने वाला जिन्ना उनका सहज मित्र बन गया, चूंकि वह उनके साथ गाय और सुअर का मांस खा लेता था और दारू के जाम छलकाने में भी उसे कोई परहेज नहीं था। अंग्रेजों ने जिन्ना केे माध्यम से शासन और कांग्रेस के सामने मांगों का पुलिंदा रखवाना शुरू किया। शासन को उसकी मांग मानने में तो कोई हिचकिचाहट नहीं थी, चूंकि पर्दे के पीछे उनके निर्देश पर तो यह सब हो ही रहा था; पर आश्चर्य तो तब हुआ, जब गांधी जी भी उनके आगे झुकते चले गये।

1942 के भारत छोड़ोआंदोलन की विफलता के बाद मुसलमानों के असहयोगी व्यवहार से कांग्रेस का मोह उनसे भंग हो चुका था; पर गांधी जी उस सांप रूपी रस्सी को थामे रहे। मई 1944 में गांधी जी ने जेल से मुक्त होने पर 17 जुलाई, 1944 को जिन्ना का एक पत्र लिखा, जिसमें उसे भाईकहकर संबोधित किया था। उन्होंने जिन्ना से भेंट की अभिलाषा व्यक्त करते हुए लिखा कि मुझे इस्लाम और भारतीय मुसलमानों का शत्रु न समझें। मैं तो सदा से आपका और मानवता का सेवक और मित्र रहा हूं। मुझे निराश न करें। चक्रवर्ती राजगोपालाचारी गांधी और जिन्ना के बीच माध्यम बन गये।

जिन्ना ने वह पत्र 30 जुलाई को मुस्लिम लीग की कार्यकारिणी में रखा। सबने प्रसन्नता व्यक्त की, कि गांधी ने पाकिस्तान की मांग सिद्धांततः मान ली है; और उस समय गांधी का अर्थ ही पूरी कांग्रेस था। अब जिन्ना ने एक शर्त रख दी कि वार्ता के लिए गांधी को माउंट प्लेजेंट रोड स्थित मेरे घर आना होगा। अतः मुंबई के इस ऐतिहासिक भवन में 9 से 27 सितम्बर तक मैराथन, पर असफल वार्ता हुई। जिन्ना ने तो पहले ही तय कर लिया था कि वार्ता से कोई परिणाम नहीं निकालना है। वह तो बस गांधी, पूरी कांग्रेस और भारत के सभी हिन्दुओं को अपमानित करना चाहता था। इतिहास गवाह है कि वह अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल रहा।

इस प्रकरण से जिन्ना का दिमाग सातवें आसमान पर पहुंच गया। मुसलमानों ने गांधी को अपमानित करने वाले को अपना निर्विवाद नेता मान लिया। वार्ता के बाद चले पत्र व्यवहार में गांधी ने जिन्ना को हर बार कायदे आजमकहा, जबकि जिन्ना ने सदा मिस्टर गांधीलिखा। वार्ता से पूर्व डा. श्यायमाप्रसाद मुखर्जी ने गांधी जी को पत्र लिखकर चेतावनी दी कि उनके इस पग में भयानक परिणाम निहित हैं, इसलिए वे यह विचार छोड़ दें। पंजाब के प्रमुख कांग्रेसी और हिन्दू नेता सर छोटूराम ने भी पत्र लिखकर कहा कि पाकिस्तान के मुद्दे पर मनुहार मुद्रा में जिन्ना से वार्ता करने से न केवल हिन्दुओं का अपितु कांग्रेस में कार्यरत मुसलमानों का भी मनोबल गिरेगा। इतिहास ने उनकी संभावना को सच सिद्ध किया। वार्ता के बाद वीर सावरकर ने कहा कि भारत के प्रांत गांधी या राजाजी की निजी जागीर नहीं हैं कि वे उन्हें चाहे जिसे दे डालें।

इस पर भी गांधी जी की आंखें नहीं खुलीं। देसाई-लियाकत समझौते के रूप में एक और प्रयास हुआ, जिसे जिन्ना ने सिरे से नकार दिया। यही हश्र वैवल योजना का हुआ, जिसमें जिन्ना के दोनों हाथों में लड्डू थे। पत्रकार दुर्गादास ने जब इस बारे में पूछा, तो शातिर जिन्ना ने हंसते हुए कहा, ‘‘क्या मैं मूर्ख हूं, जो इसे स्वीकार कर लूं। मुझे तो थाल में सजा कर पाकिस्तान प्रस्तुत किया जा रहा है।’’ स्पष्ट है कि जिन्ना की निगाह अपने अंतिम लक्ष्य पाकिस्तान पर थी। वह उसकी ओर बढ़ते रहे और अंततः सफल हुए।

इसके बाद तो जो कुछ हुआ, वह इतिहास के काले पृष्ठों में दर्ज है। 16 अगस्त, 1946 का डायरेक्ट एक्शन डेजिसमें पूरे बंगाल में मुस्लिम मुख्यमंत्री सुहरावर्दी के नेतृत्व में खुला हत्याकांड हुआ। अकेले कोलकाता में ही 3,000 हिन्दू मारे गये। सड़कें लाशों से पट गयीं, जिन्हें तीन दिन तक उठाया नहीं गया। इससे कांग्रेसी नेता डर गये। यह देखकर जिन्ना ने कहा कि अब हिन्दुओं का भी हित इसी में है कि वे पाकिस्तान की मांग को स्वीकार कर लें। चाहे तो केवल हिन्दुओं को कत्लेआम और विनाश से बचाने के लिए ही। उसने स्पष्ट कहा कि या तो भारत का विभाजन होगा या फिर विनाश।

इतिहास भले ही कितना निर्मम और कटु हो; पर उसे स्वीकार करना ही पड़ता है। देशभक्त जिन्ना को अलगाववादी बनाने का श्रेय जहां एक ओर भारतीय मुसलमानों को है, तो दूसरी ओर गांधी को भी है, जो नेहरू को अपने जीते जी भारत का प्रधानमंत्री बना देखना चाहते थे। देशभक्त जिन्ना के अलगाववादी बनने की कहानी बताती है कि सांप को दूध पिलाने से उसका विष कम नहीं होता। आग में घी डालने से वह बुझने की बजाय और प्रबल होती है। आज देश में जैसा माहौल बनाया जा रहा है, उसमें यह समझना एक बार फिर जरूरी हो गया है।

मंगलवार, 6 मार्च 2018

एक देश एक चुनाव, कितने व्यावहारिक ?

परिवर्तन की बात करना राजनेताओं और समाजसेवियों में प्रचलित एक फैशन है। इन दिनों ‘एक देश एक चुनाव’ की चर्चा गरम हैं। कुछ लोग इसके पक्ष में हैं, तो कुछ विपक्ष में। कुछ दलों और नेताओं को इसमें लाभ दिख रहा है, तो कुछ को हानि। अतः वे वैसी ही भाषा बोल रहे हैं; पर एक साथ चुनाव के समर्थकों के पास भी इसका कोई ठोस प्रारूप नहीं है। लगता है सबने ये काम नरेन्द्र मोदी पर ही छोड़ दिया है।

जहां तक परिवर्तन की बात है, तो वह लोकतन्त्र की मर्यादा में होना चाहिए। यद्यपि वर्तमान चुनाव प्रणाली भी पूर्णतया लोकतान्त्रिक है; पर भ्रष्टाचार, जातिवाद, मजहबवाद, क्षेत्रीयता, महंगाई, अनैतिकता और कामचोरी लगातार बढ़ रही है। इसका कारण यह दूषित चुनाव प्रणाली ही है। दुनिया में कई प्रकार की चुनाव प्रणालियां प्रचलित हैं। हमने उन पर विचार किये बिना उस ब्रिटिश प्रणाली को अपना लिया, जिसे गांधी जी ने ‘बांझ’ कहा था। अब तो इंग्लैंड में भी यदाकदा इसे बदलने और सांसदों की संख्या घटाने की बात उठती रहती है।   

यदि आप किसी सांसद या विधायक से मिलें, तो वह अपने क्षेत्र की बिजली-पानी, सड़क और नाली की व्यवस्था में उलझा मिलेगा। यदि वह ऐसा न करे, तो अगली बार उसे वोट नहीं मिलेंगे। सरकार द्वारा बनायी गयी खर्च की सीमा चाहे जो हो; पर पैसा इससे कई गुना अधिक खर्च होता है। पार्टी तो उसे इतना देती नहीं। ऐसे में अधिकांश लोग इधर-उधर से धन जुटाते हैं। भारत में लगातार बढ़ रहे भ्रष्टाचार का मुख्य कारण यही है। 

लोकसभा और विधानसभा का काम देश और प्रदेश के लिए नियम बनाना है; पर सांसद और विधायक यह नहीं करते। यह उनकी मजबूरी भी है। अतः इस चुनाव प्रणाली के बदले हमें भारत में ‘आनुपातिक या सूची प्रणाली’ का प्रयोग करना चाहिए। जर्मनी में यह प्रचलित है। इसमें प्रत्येक राजनीतिक दल को सदन की संख्या के अनुसार  चुनाव से पहले अपने प्रत्याशियों की सूची चुनाव आयोग को देनी होगी। जैसे लोकसभा में 525 स्थान हैं, तो प्रत्येक दल 525 लोगों की सूची देगा। इसके बाद वह दल चुनाव लड़ेगा, व्यक्ति नहीं। चुनाव में व्यक्ति का कम, दल का अधिक प्रचार होगा। हर दल अपने विचार और कार्यक्रम जनता को बताएगा। इसके आधार पर जनता उस दल को वोट देगी। 

चुनाव में जिस दल को जितने प्रतिशत वोट मिलेंगे, उसके उतने प्रतिशत लोग सूची में से क्रमवार सांसद घोषित कर दिये जाएंगे। यदि किसी एक दल को बहुमत न मिले, तो वह मित्र दलों के साथ सरकार बना सकता है। इस प्रणाली से चुनाव का खर्च बहुत घट जाएगा। इसमें उपचुनाव का झंझट भी नहीं है। किसी सांसद की मृत्यु या त्यागपत्र देने पर सूची का अगला व्यक्ति शेष समय के लिए सांसद बन जाएगा। 

इस व्यवस्था से अच्छे, शिक्षित तथा अनुभवी लोग राजनीति में आएंगे। इससे जातीय समीकरण टूटेंगे। आज तो दलों को जातीय या क्षेत्रीय समीकरण के कारण कई बार दलबदलू या अपराधी को भी टिकट देना पड़ता है। उपचुनाव में सहानुभूति के वोट पाने के लिए मृतक के परिजन को इसीलिए टिकट दिया जाता है। सूची प्रणाली में ऐसा कोई झंझट नहीं है।

इसमें हर सांसद या विधायक किसी क्षेत्र विशेष का न होकर पूरे देश या प्रदेश का होगा। अतः उस पर किसी जातीय या मजहबी समीकरण के कारण सदन में किसी बात को मानने या न मानने की मजबूरी नहीं होगी। किसी भी प्रश्न पर विचार करते सबके सामने जाति, क्षेत्र या मजहब की बजाय पूरे देश या प्रदेश का हित होगा। इससे राजनीति में वही दल बचेंगे, जो पूरे देश के बारे में सोचते हैं। जाति, क्षेत्र या मजहब की राजनीति करने वाले दल तथा अपराधी, भ्रष्ट और खानदानी नेता समाप्त हो जाएंगे। उन्हें एक-दो सांसदों या विधायकों के कारण सरकार को बंधक बनाने का अवसर नहीं मिलेगा। अर्थात मजबूर की बजाय मजबूत सरकारें बनेंगी और राजनीति क्रमशः शुद्ध होती जाएगी। 

पर ऐसे में जनता का प्रतिनिधि कौन होगा ? इसके लिए हमें जिला, नगर, ग्राम पंचायतों के चुनाव निर्दलीय आधार पर वर्तमान व्यवस्था की तरह ही कराने होंगे। इन लोगों का अपने क्षेत्र की नाली, पानी, बिजली और थाने से काम पड़ता है। इस प्रकार चुने गये जनप्रतिनिधि प्रदेश और देश के सदनों द्वारा बनाये गये कानूनों के प्रकाश में अपने क्षेत्र के विकास का काम करेंगे। ऊपर भ्रष्टाचार न होने पर नीचे की संभावनाएं भी कम हो जाएंगी। यद्यपि इससे कुछ समय के लिए सूची बनाने वाले बड़े नेताओं का प्रभाव बहुत बढ़ जाएगा; पर यदि वे जमीनी, अनुभवी और काम करने वालों को सूची में नहीं रखेंगे, तो जनता उन्हें ठुकरा देगी। अतः एक-दो चुनाव में व्यवस्था स्वयं ठीक हो जाएगी।

इस प्रणाली में नये दल का निर्माण, राष्ट्रीय या राज्य स्तर के दल की अर्हता, दलों की सदस्यता और आंतरिक चुनाव आदि पर निर्णय लेने के लिए चुनाव आयोग को कुछ और अधिकार देने होंगे। ‘‘एके साधे सब सधे, सब साधे सब जाए’’ की तर्ज पर कहें, तो चुनाव प्रणाली बदलकर, चुनाव को सस्ता और जाति, क्षेत्र, मजहब आदि के चंगुल से मुक्त करने से देश की अनेक समस्याएं हल हो जाएंगी। बार-बार चुनाव होना भी उनमें से एक है। जब तक यह नहीं होता, तब तक मार्च और अक्तूबर के पहले सप्ताह को गांव से लेकर लोकसभा के चुनावों के लिए नियत किया जा सकता है। इससे समस्या का पूरी तरह समाधान तो नहीं होगा; पर कुछ राहत जरूर मिलेगी।

सोमवार, 5 मार्च 2018

बेर-केर को संग

सुना है कि मायावती ने कुछ शर्तों के साथ उ.प्र. में होने वाले उपचुनावों में स.पा. को समर्थन देने का प्रस्ताव दिया है। उनका कहना है कि वे गोरखपुर और फूलपुर की संसदीय सीट पर अपने वोट उन्हें देने को तैयार हैं। बदले में राज्यसभा और विधान परिषद की सीट के लिए स.पा. को अपने अतिरिक्त वोट ब.स.पा. को देने होंगे। 

पता नहीं यह प्रस्ताव अखिलेश बाबू ने माना या नहीं; पर कुछ लोगों ने यह घोषित कर दिया है कि ये दोनों 2019 में लोकसभा चुनाव मिलकर लड़ेंगे। याद रहे कि 1993 में दोनों ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा था और भा.ज.पा. को हराकर मुलायम सिंह के नेतृत्व में उ.प्र. में सरकार बनी थी। उन दिनों एक नारा खूब चला था, ‘‘मिले मुलायम काशीराम, हवा में उड़ गये जय श्रीराम।’’   

कई अखबार और मोदी विरोधी 1993 के वोट प्रतिशत निकालकर भावी समीकरण बना रहे हैं; पर वे भूलते हैं कि चुनावों में दो और दो हमेशा चार नहीं होते। फिर काशीराम जी दिवंगत हो चुके हैं और मुलायम जबरन रिटायर। अब इधर मायावती हैं तो उधर अखिलेश। जहां तक भा.ज.पा. की बात है, तो अब उ.प्र. में योगी आदित्यनाथ हैं, तो दिल्ली में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी। गंगा और यमुना में तबसे न जाने कितना पानी बह चुका है। इसलिए 1993 के आधार पर चुनावी गणना दिमागी कसरत से ज्यादा  कुछ नहीं है। 

जहां तक इन दोनों के साथ की बात है, तो अधिकांश लोगों को पुरानी बातें याद नहीं होंगी। यद्यपि समय सब पुराने और गहरे घाव भर देता है; पर उनके निशान नहीं जाते। इसीलिए मुख्यमंत्री योगी ने इस पर टिप्पणी करते हुए इसे बेर-केर का साथ कहा है। रहीम जी का वह दोहा बहुत प्रसिद्ध है - 

कह रहीम कैसे निभे, बेर-केर को संग
वे डोलत रस आपने, उनके फाटत अंग।।

(रहीमदास जी कहते हैं कि बेर और केले का साथ कैसे हो सकता है ? बेर जब अपनी मस्ती में डोलता है, तो उसके कांटों से केले के पत्ते फट जाते हैं। अर्थात इनका साथ असंभव है।)

इस संदर्भ को देखें, तो स.पा. और ब.स.पा. का वोट बैंक ही नहीं, इनके नेताओं और कार्यकर्ताओं का स्वभाव भी बिल्कुल अलग है। स.पा. की स्थापना मुलायम सिंह ने की थी। वे खुद को डा. राम मनोहर लोहिया, जनेश्वर मिश्र और आचार्य नरेन्द्र देव जैसे समाजवादियों का अनुयायी मानते हैं; पर सत्ता पाते ही वे उन्हें भूलकर घोर भ्रष्टाचार, मजहबवाद और परिवारवाद में डूब गये। इसी तर्ज पर अब अखिलेश ने उन्हें और अपने चाचा को एक तरफ कर पार्टी पर कब्जा कर लिया है।

दूसरी ओर ब.स.पा. की स्थापना काशीराम ने की थी। पार्टी की स्थापना से पूर्व उन्होंने सरकारी कर्मचारियों और निर्धन वर्ग में कई संगठन बनाकर गहरा काम किया। उन्होंने स्वयं पीछे रहकर हर राज्य में कुशल नेतृत्व खड़ा किया। सबसे पहले उन्हें उ.प्र. में सफलता मिली और यहां मायावती मुख्यमंत्री बन गयीं। यद्यपि कुछ समय बाद उनकी तबीयत बिगड़ गयी और पार्टी पर मायावती का कब्जा हो गया। फिर मायावती ने काशीराम द्वारा विभिन्न राज्यों में तैयार किये गये नेताओं को एक-एक कर बाहर निकाल दिया। आज ब.स.पा. का अर्थ मायावती और उनकी बात ही ब.स.पा. का संविधान है। 

काशीराम ने ही 1993 में स.पा. और ब.स.पा. में समझौता कराया था। इससे पूर्व वहां कल्याण सिंह के नेतृत्व में भा.ज.पा. की सरकार थी। 1992 में हुए बाबरी ध्वंस से मुसलमान नाराज थे। इसका लाभ उठाकर दोनों दलों ने हाथ मिलाया। यद्यपि उन्हें बहुमत नहीं मिला; पर भा.ज.पा. विरोधी अन्य दलों को साथ लेकर मुलायम सिंह मुख्यमंत्री बन गये; पर काशीराम की सोच बिल्कुल स्पष्ट थे। उनका मानना था कि जितनी बार चुनाव होंगे, हमारे वोट बढ़ेंगे। वे कहते थे कि पहले चुनाव में हम हारते हैं, दूसरे में हराते हैं और तीसरे में जीतते हैं। इसी सोच के चलते उन्होंने सरकार से समर्थन वापस ले लिया।

इससे उ.प्र. की राजनीति में तूफान आ गया। दो जून, 1995 को मुलायम सिंह के साथियों ने लखनऊ के मीराबाई मार्ग स्थित अतिथि निवास पर हमला बोल दिया। वहां ठहरी मायावती से उन्होंने हाथापाई की। यदि भा.ज.पा. नेता ब्रह्मदत्त द्विवेदी और कुछ भले पुलिसकर्मी वहां न होते, तो मायावती की इज्जत और जान दोनों ही जा सकती थी। तबसे ही मायावती और मुलायम सिंह के बीच स्थायी बैर हो गया, जो आज तक चला आ रहा है।

ऐसा ही विरोध दोनों के प्रतिबद्ध वोटरों में है। स.पा. का मुख्य वोटबैंक यादव है, तो ब.स.पा. का अनुसूचित जाति वर्ग। उ.प्र. में यादव सबसे बड़ा ओ.बी.सी. समुदाय है। गांवों में खेती की अधिकांश जमीन ओ.बी.सी. वर्ग के पास ही है। शिक्षित, सशस्त्र और धनवान होने से उनका राजनीति में प्रभावी दखल है। उनकी जमीनों पर भूमिहीन अनु.जाति वाले मजदूरी करते हैं। अभी तक तो ये लोग दबकर रहते थे; पर अब आरक्षण के कारण वे भी शिक्षा तथा नौकरियां पा रहे हैं। इससे उन पर भी पैसा आया है तथा उनका मनोबल बढ़ा है। शासन भी निर्धन वर्ग का उत्थान चाहता है। अतः इनमें प्रायः टकराव होता रहता है। यह मनभेद इतना अधिक है कि ऊपर वाले नेता भले ही मिल जाएं; पर जमीनी स्तर पर दिल मिलना कठिन है।

यही स्थिति मुसलमानों की है। उनसे ओ.बी.सी. तथा निर्धन वर्ग दोनों ही पीड़ित हैं। उनकी बढ़ती जनसंख्या से सब आतंकित हैं। मुसलमान रणनीति बनाकर वोट करते हैं। जो दल या प्रत्याशी भा.ज.पा. को हराने में सक्षम हो, वे उसके पक्ष में झुक जाते हैं। इसलिए ये कभी स.पा. तो कभी ब.स.पा. के साथ दिखाई देते हैं।

इस माहौल में स.पा. और ब.स.पा. की दोस्ती पर विचार करें, तो यह नितांत अव्यावहारिक है। मायावती की विश्वसनीयता शून्य है। वे हर दल के साथ गठबंधन करके उसे अपने स्वार्थ के चलते तोड़ चुकी हैं। फिर भी उनका कुछ प्रतिबद्ध वोटर जरूर है। यद्यपि अब यह लगातार घट रहा है। इसीलिए लोकसभा चुनाव में उ.प्र. में उनका खाता नहीं खुला तथा विधानसभा में वे तीसरे नंबर पर पहुंच गयी। 

ब.स.पा. का आधार उ.प्र. में है तथा मायावती उसका एकमात्र चेहरा है। बढ़ती आयु के कारण अब वे उतना परिश्रम नहीं कर सकतीं, जितना आज से 20 साल पहले कर लेती थीं। अब उनके सिर पर काशीराम जैसे चिंतक और मार्गदर्शक का हाथ भी नहीं है। ब.स.पा. में उनके आगे कोई नेतृत्व भी नहीं है। अर्थात ब.स.पा. का उ.प्र. में ही कोई भविष्य नहीं है। दूसरी ओर अखिलेश अभी युवा हैं। बात कितनी भी हो; पर असली लड़ाई उ.प्र. के विधानसभा चुनाव में मुख्यमंत्री की कुरसी के लिए होगी। ऐसे में यह साथ निभना असंभव है। योगी जी ने इसीलिए बेर और केर की बात कही है। ऐसा ही एक दोहा ‘बिहारी सतसई’ में भी है।

कहलाने एकत बसत, अहि मयूर मृग वाघ
जगत तपोवन सों कियो, दीरघ दाघ निदाघ।। (565)

(बिहारी जी पूछते हैं कि सांप, मोर, हिरन और बाघ परस्पर शत्रु होकर भी एक साथ क्यों बैठे हैं ? फिर वे कहते हैं कि भीषण गरमी के कारण ये ऐसा करने को मजबूर हैं।)

देश इस समय मोदी के ताप से तप रहा है। शायद इसीलिए स.पा. और ब.स.पा. ही नहीं, कांग्रेस, ममता और वामपंथी जैसे शेष दल भी अपनी शत्रुता छोड़कर एक साथ आने को मचल रहे हैं।

रविवार, 4 मार्च 2018

कुछ याद उन्हें भी कर लो..

भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता पूरे देश में त्रिपुरा और पूर्वोत्तर भारत में हुई विशाल जीत का जश्न मना रहे हैं। यह जश्न स्वाभाविक भी है। जहां लम्बे समय तक उन्हें कोई पूछता नहीं था, वहां ऐसी विराट सफलता सचमुच आश्चर्यजनक ही है; पर इसके पीछे संघ और समविचारी संगठनों का योजनाबद्ध परिश्रम छिपा है। इसे जाने बिना यह सफलता समझ नहीं आ सकती।

संघ का काम तो सीधे-सीधे शाखा का ही है, जिसमें सब तरह के लोग आते हैं। उम्र और काम के हिसाब से उनकी अलग-अलग शाखाएं लगती हैं। शाखा में आने से अनुशासन और देशप्रेम का भाव जागता है। इससे बिना किसी विशेष प्रयास के स्वयंसेवक एवं कार्यकर्ता का निर्माण होता चलता है। स्वयंसेवक अपने व्यवहार से क्रमशः अपने परिवार, गांव, मोहल्ले और दफ्तर को भी प्रभावित करता है। इसी तरह संघ का काम बढ़ा है।

इसके अलावा संघ ने क्षेत्र विशेष की परिस्थिति के अनुसार अन्य कई काम भी शुरू किये हैं। सेवा के काम इनमें सबसे महत्वपूर्ण हैं। आपातकाल के बाद सरसंघचालक श्री बालासाहब देवरस ने सेवा कार्यों पर जोर दिया। संघ के वरिष्ठ प्रचारक श्री विष्णु जी की देखरेख में सबसे पहले दिल्ली की निर्धन बस्तियों में और फिर पूरे देश में ऐसे केन्द्र खोले गये। इनकी संख्या अब एक लाख से भी अधिक है। शिक्षा, चिकित्सा, रोजगार प्रशिक्षण, संस्कारशाला, कीर्तन मंडली..जैसे इन केन्द्रों से हर वर्ग और उम्र के लोग संपर्क में आते हैं। इनसे सेवा के साथ ही संघ का विचार भी लोगों तक पहुंचता है। संघ विचार का हर संगठन किसी न किसी रूप में सेवा जरूर कर रहा है।

‘वनवासी कल्याण आश्रम’ नामक संगठन जनजातियों के बीच काम करता है। संस्था द्वारा लड़के और लड़कियों के अलग-अलग सैकड़ों छात्रावास पूरे देश में चल रहे हैं। समाज के सहयोग से संचालित इन छात्रावासों के छात्र अन्य राज्य वालों के संपर्क में आते हैं। इससे उनके मन का अलगाव दूर होता है। उन्हें पता लगता है कि वे केवल अपने राज्य, कबीले या जनजाति के नहीं, पूरे भारत के नागरिक हैं। ये छात्र जब अपने गांव वापिस जाते हैं, तो उनके संस्कारों से पूरा गांव प्रभावित होता है। 

इन छात्रावासों से सैकड़ों पूर्णकालिक कार्यकर्ता भी बने हैं, जो अपने ही क्षेत्र में काम कर रहे हैं। ईसाई भी वहां इसी विधि से बढ़े हैं; पर वे उन्हें अपने देश, धर्म, परम्परा, भाषा, भूषा आदि से काटते हैं, जबकि संघ इनसे जोड़ता है। इसीलिए जिस अलगाव को फैलाने में ईसाई मिशनरियों को 300 साल लगे, उसे संघ 50 साल में ही दूर करने में सफल हो रहा है। 

विश्व हिन्दू परिषद भी अपने स्थापना काल (1964) से यहां के साधु-संतों के बीच काम कर रहा है। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय धर्म सभाओं में जब ये संत जाते हैं, तो इनका दृष्टिकोण व्यापक होता है। इससे वह क्षेत्र तथा जनजाति संपर्क में आती है, जहां इनका प्रभाव है। वि.हि.प. की ‘एकल विद्यालय योजना’ से भी यहां व्यापक परिवर्तन हुआ है। 

अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद द्वारा 1966 से संचालित ‘अंतरराज्यीय छात्र जीवन दर्शन’ प्रकल्प का पूर्वोत्तर में बहुत लाभ हुआ है। इसके अन्तर्गत युवाओं को दूसरे राज्यों में भ्रमण पर ले जाकर उन्हें परिवारों में ठहराते हैं। इससे राष्ट्रीय एकता की भावना विकसित होती है। ऐसे कई युवा राजनीति में भी सक्रिय हैं। कन्याकुमारी के विवेकानंद केन्द्र से संचालित विद्यालय एवं छात्रावासों की भूमिका भी महत्वपूर्ण है।

लेकिन ये काम इतना आसान नहीं रहा। त्रिपुरा में वामपंथी और अन्य राज्यों में प्रभावी ईसाइयों ने संघ का सदा हिंसक विरोध किया है। अतः पूरे देश से सैकड़ों साहसी, समर्पित और सुशिक्षित प्रचारक वहां भेजे गये। भा.ज.पा. की जीत के कारण महाराष्ट्र निवासी जिन सुनील देवधर का नाम मीडिया में चर्चित है, वे भी ऐसे ही कार्यकर्ता हैं। ये सब स्थानीय भाषा, बोली, खानपान और रीति-रिवाजों के साथ समरस होकर रहते हैं। इनके जमीनी काम के कारण अब स्थानीय कार्यकर्ता भी बड़ी संख्या में प्रचारक एवं पूर्णकालिक बन रहे हैं। अब हवा बदली है, तो संघ का काम और तेजी से बढ़ेगा।

इस दौरान कई कार्यकर्ताओं को अपने प्राण भी खोने पड़े। भा.ज.पा. कार्यालय में अपने भाषण के दौरान नरेन्द्र मोदी ने मौन रहकर उन्हें श्रद्धांजलि दी है। ऐसे चार कार्यकर्ताओं की चर्चा यहां उचित होगी, जिनका छह अगस्त, 1999 को कंचनपुरा स्थित वनवासी कल्याण आश्रम के एक छात्रावास से अपहरण किया गया था। त्रिपुरा के वामपंथी शासन ने उनकी खोज का नाटक तो किया; पर उससे कुछ नहीं हुआ और उनकी निर्मम हत्या कर दी गयी। यह घृणित कार्य बैपटिस्ट ईसाई मिशन से प्रेरित एन.एल.एफ.टी. नामक आतंकी गुट ने किया था। 

उन दिनों दिल्ली में अटल जी की सरकार थी। जब-जब केन्द्र ने इनकी खोज का प्रयास किया, तब-तब उन्हें चटगांव (बंगलादेश) भेज दिया जाता था। 28 जुलाई, 2001 को शासन ने उनकी हत्या की घोषणा कर दी। यद्यपि ये हत्या छह महीने पहले कर दी गयी थीं। मार्च 2000 में गुवाहाटी के संघ कार्यालय में चारों द्वारा हस्ताक्षरित एक पत्र आया था। उसमें उन्होंने लिखा था कि वे अभी जीवित हैं; पर भीषण शारीरिक और मानसिक यातना झेल रहे हैं।

ये कार्यकर्ता थे पूर्वांचल क्षेत्र कार्यवाह श्री श्यामलकांति सेनगुप्त (68), विभाग प्रचारक सुधामय दत्त (51), जिला प्रचारक शुभंकर चक्रवर्ती (38) तथा शारीरिक शिक्षण प्रमुख दीपेन्द्र डे (46)। पता नहीं उनकी हत्या कब, कैसे और कहां हुई तथा उनके शवों का क्या हुआ ? ऐसे में उनके परिजनों का दर्द समझा जा सकता है। श्यामल जी गृहस्थ थे, जबकि बाकी तीनों अविवाहित प्रचारक। इसके अलावा सर्वश्री ओमप्रकाश चतुर्वेदी, मुरलीधरन, प्रमोद नारायण दीक्षित, प्रफुल्ल गोगोई, शुक्लेश्वर मेधी तथा मधुमंगल शर्मा भी आंतक के शिकार हुए हैं।

आज पूर्वोत्तर भारत का वातावरण केसरिया हो रहा है। ऐसे में उन कार्यकर्ताओं की याद आना स्वाभाविक है, जिन्होंने देश की सेवा में प्राण अर्पित कर दिये। इन हत्याओं की पूरी जांच तथा हत्यारे आतंकी गुटों का समूल नाश त्रिपुरा की नयी भा.ज.पा. सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।

शुक्रवार, 2 मार्च 2018

उत्तराखंड में पलायन

इन दिनों उत्तराखंड की किसी भी सभा, गोष्ठी या सेमिनार में जाएं, वहां सबसे अधिक चिंता पलायन की होती है। मजे की बात ये भी है कि पलायन रोकने के सूत्र बताने वाले विशेषज्ञ प्रायः दिल्ली, नौएडा, लखनऊ, चंडीगढ़, मुंबई आदि से आते हैं। जो लोग खुद को आज भी उत्तराखंड वाला कहते हैं, वे भी देहरादून, हरिद्वार, ऋषिकेश, कोटद्वार, काशीपुर, रुद्रपुर, हल्द्वानी, खटीमा या टनकपुर जैसे मैदानी क्षेत्र में बस गये हैं। अपना गांव छोड़ चुके ऐसे लोग जब पलायन रोकने के उपाय बताते हैं, तो ऐसा लगता है मानो दशमुख रावण ही व्यासपीठ पर बैठकर रामकथा सुना रहा हो। अधिकांश पहाड़ी गांवों में या तो बुजुर्ग बचे हैं या फिर वे लोग, जिनके पास नीचे घर या जमीन खरीदने लायक पैसा नहीं है। इसीलिए घरों में ताले लग रहे हैं और गांव लगातार खाली हो रहे हैं। 

पिछले दिनों ऐसी ही एक गोष्ठी में जाने का मौका मिला। वहां जो सुना, उससे उनकी कठिनाई समझ में आती है। सबसे बड़ी समस्या इस समय बंदरों की है। फसल बोते ही बंदर उसे उजाड़ देते हैं। पहले वे तेज आवाज वाले पटाखों से डरते थे; पर अब नहीं। पटाखे जलाते ही वे कुछ दूर जाकर फिर लौट आते हैं। बंदर केवल फसल ही नहीं उजाड़ते, वे घर के बाहर रखी खाद्य सामग्री भी उठा लेते हैं। कभी-कभी तो हाथ से ही छीन लेते हैं। बच्चों और अकेले बैठे धूप सेक रहे बुजुर्गों को वे काट भी लेते हैं। पहले लोग घर की छत पर कद्दू या मकई सुखा देते थे; पर अब बंदरों के कारण यह संभव नहीं रहा। बंदरों से बचने को कुछ लोगों ने कुत्ते पाले; पर उनके कारण वहां बाघ आने लगता है और मौका मिलते ही वह कुत्ते को उठा लेता है। यदि गांव वाले बाघ को मार दें, तो उन पर मुकदमा दर्ज हो जाता है। बाघ को मारें, तो मुकदमा और न मारें तो अपनी जान का खतरा। अतः लोग दोनों तरफ से पिस रहे हैं।

बंदरों की जनसंख्या वृद्धि का एक कारण जंगलों का विस्तार भी है। पहले गांव के लोग रसोई के लिए जंगल से ही लकड़ी लाते थे; पर अब हर घर में गैस आ गयी है। इससे जंगलों का कटान रुका है। यह महिलाओं के स्वास्थ्य, सुविधा और पर्यावरण के लिहाज से तो अच्छा है; पर इससे बंदर भी बढ़ रहे हैं। बंदरों को मारना लोग अच्छा नहीं समझते और यह संभव भी नहीं है। अतः उनकी जनसंख्या नियंत्रण का कोई व्यावहारिक उपाय सोचना होगा।

उत्तराखंड के ऊंचाई वाले गांवों में सेब की फसल अच्छी होती है। सेब के पेड़ों को कम से कम दो महीने खूब ठंडा मौसम चाहिए; लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के चलते सेब पट्टी पीछे खिसक रही है। पहाड़ में छोटे-छोटे सीढ़ीदार खेत होते हैं। दूर-दूर होने से वहां खेती में कठिनाई आती है। चकबंदी है तो; पर वह स्वैच्छिक है। यदि गांव में सब चाहें, तभी यह संभव है। जो लोग नौकरी आदि के कारण नीचे बस गये हैं, उन्हें इसमें कोई रुचि नहीं है। अतः जो लोग वहां रह रहे हैं, वे परेशान हैं।

समस्या उन किसानों के साथ भी है, जो तराई में बसे हैं। वहां हाथियों ने उन्हें दुखी कर रखा है। अत्यधिक दोहन से जल का स्तर गिर गया है और प्राकृतिक तालाब सूख गये हैं। अतः प्यासे हाथी जंगल से निकलकर नदी या नहर तक आते हैं। इस दौरान रास्ते में पड़ने वाले खेत और मकानों को वे नष्ट कर देते हैं। कई जंगलों को बिजली के हल्के करेंट वाली तारों से घेरा गया है; पर हाथी पेड़ तोड़कर उनके ऊपर गिरा देते हैं। इससे तार टूट जाते हैं और फिर हाथी उसी को स्थायी रास्ता बना लेते हैं। 

आजकल पहाड़ में तेजी से विकास हो रहा है। बारहमासी (ऑल वैदर) रोड तथा बांधों पर काम हो रहा है। सरकार चाहती है कि लाखों की बजाय करोड़ों पर्यटक यहां आएं। अतः हवाई यातायात बढ़ाने के लिए हवाई अड्डे तथा हैलिपैड बन रहे हैं। यह सोच गलत नहीं है। पहाड़ की आर्थिकी का आधार फौज या नौकरी के लिए बाहर गये लोग तथा धार्मिक पर्यटन ही है। विकास के लिए नयी सड़कों का निर्माण, पुरानी सड़कों का चौड़ीकरण और इसके लिए रास्ते में आने वाले भवन तथा खेतों का अधिग्रहण जरूरी है। इसके लिए सरकार भरपूर मुआवजा देती है; पर मुआवजा मिलते ही व्यक्ति मैदानी क्षेत्र में घर खरीद लेता है। बुजुर्ग तो अपने पुश्तैनी गांव में रहना चाहते हैं; पर युवा नहीं। ऐसे में युवा पीढ़ी के आगे बुजुर्गों को झुकना पड़ता है। इस प्रकार यह मुआवजा भी पलायन में सहायक हो रहा है। लोगों का सुझाव है कि मुआवजे की बजाय शासन वहां मकान बनाकर दे और यह काम उजाड़ने से पहले होना चाहिए।

पहाड़ से पलायन का एक कारण शिक्षा भी है। हर व्यक्ति चाहता है कि उसके बच्चे अच्छे स्कूलों में पढ़ें। इसके लिए वह हर कष्ट उठाने को तैयार है। जिसके पास भी थोड़ा पैसा है, वह मैदानी क्षेत्र में मकान खरीद कर या किराये पर लेकर बच्चों को पढ़ा रहा है। परिवार की महिलाओं में से एक बच्चों के साथ रहती है, तो दूसरी गांव में। जो बच्चे मैदानी क्षेत्रों में रहकर पढ़ रहे हैं, वे बड़े होकर फिर यहीं बस जाते हैं। यदि प्राथमिक, जूनियर तथा हाई स्कूल तक की अच्छी शिक्षा गांवों के आसपास हो, तो जहां एक ओर शिक्षा का स्तर सुधरेगा, वहां शिक्षा के लिए पलायन भी रुकेगा। 

यही हाल स्वास्थ्य सुविधाओं का भी है। कई जगह अस्पताल तो हैं; पर डॉक्टर नहीं। डॉक्टर हैं, तो अच्छा भवन, उपकरण या बिजली नहीं। इसलिए डॉक्टर हो या अध्यापक या कोई अन्य सरकारी कर्मचारी, सब नीचे आना चाहते हैं। यह मानसिकता बदलना कठिन है। यद्यपि पहाड़ में जैविक खेती की संभावनाएं हैं; पर शासन का ध्यान इधर कम है। पहाड़ी उपज की बिक्री की भी समस्या है। यदि हर न्याय पंचायत केन्द्र पर अच्छी मंडी हो, तो गांव के युवाओं को घर के पास ही रोजगार मिल सकता है। शासन ने सभी न्याय पंचायत केन्द्रों का विकास नये शहरों के रूप में करने की घोषणा की है। यह अच्छा प्रयास है। यदि इन स्थानों पर अच्छे स्कूल, अस्पताल तथा मनोरंजन केन्द्र भी बनें, तो पलायन की गति कम होगी।

उत्तराखंड की राजधानी देहरादून बनने से भी पलायन बढ़ा है। ग्राम प्रधान हो या कोई और जन प्रतिनिधि, सब बार-बार यहां आते हैं। सरकारी योजनाओं ने सबकी जेबें भर दी हैं। ऐसे में शहर की चकाचौंध से प्रभावित होकर अधिकांश ने देहरादून में ही घर बना लिया है। ठीक भी है, जब सरकार ही पहाड़ में रहना नहीं चाहती, तो वे क्यों रहें ? राजधानी के लिए गैरसैण का चयन राज्य बनने से पहले ही हो गया था। सरकार ने लोगों को मूर्ख बनाने के लिए अरबों रुपया खर्च कर वहां विधान भवन आदि बनाये भी हैं; पर देहरादून की सुख-सुविधा छोड़कर कोई नेता या अधिकारी वहां स्थायी रूप से बसना नहीं चाहता।

यों तो हर व्यक्ति वर्तमान से आगे बढ़ना चाहता है। मैदानी क्षेत्रों में गांव के सम्पन्न लोग शहर में भी एक मकान बना लेते हैं। फिर परिवार के कुछ लोग स्थायी रूप से वहीं बस जाते हैं। अर्थात पलायन वहां भी है; पर उत्तराखंड में पलायन खतरनाक है। चूंकि यह राज्य चीन और नेपाल की सीमा से लगा है। यदि सीमावर्ती गांव खाली हो गये, तो वहां कब शत्रु आकर बैठ जाए, कहना कठिन है। एक खास बात यह भी है कि पलायन की चिंता बड़ी आयु वालों को ही है। युवा पीढ़ी अपना कैरियर बनाने में व्यस्त है। कई पेंशनभोगी बुजुर्ग गांव में रहना चाहते हैं; पर स्वास्थ्य की चिंता तथा बच्चों का मोह उन्हें बांध लेता है। ऐसे में यदि पलायन रोकना है, तो केन्द्र और राज्य सरकार के साथ समाज को भी मिलकर काम करना होगा।

शनिवार, 24 फ़रवरी 2018

कांग्रेस में घर वापसी

काफी लम्बी हिचक और ना-नुच के बावजूद राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष बन ही गये। जैसे व्यापारियों के लड़के इच्छा न होने पर भी अपनी नियति मानकर कारोबार में लग जाते हैं। यद्यपि ऐसे अधिकांश लोग आधुनिक शिक्षा और युवा उत्साह के कारण घरेलू कारोबार को कई गुना बढ़ा भी देते हैं। देश हो या विदेश, उद्योगपतियों की नयी पीढ़ी कारोबार को नयी ऊंचाइयों पर ले जा रही है।

इसी तरह राहुल गांधी भी काफी समय तो टालते रहे; पर ‘‘ना ना करते प्यार तुम्हीं से कर बैठे..’’ की तर्ज पर आखिरकार उन्होंने अध्यक्ष बनना मान ही लिया। जैसे लड़के की शादी के बाद मां-बाप सोचते हैं कि उन्होंने अपना कर्तव्य पूरा कर दिया। अब आगे बेटा और बहू जानें या उनकी किस्मत। बस ऐसा ही राहुल के साथ है। अब कांग्रेस का भविष्य उनके पल्लू के साथ बंधा है।

पिछले दिनों राहुल गांधी ने अपील करते हुए कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी जैसी फासिस्ट ताकतों से मुकाबला करने के लिए वे सब पुराने लोग वापस घर आ जाएं, जो कभी कांग्रेस छोड़कर चले गये थे। संघ और विश्व हिन्दू परिषद वाले लम्बे समय से ‘घर वापसी’ के काम में लगे हैं। वे कहते हैं कि भारत के उन सब लोगों को अपने पूर्वजों के पवित्र हिन्दू धर्म में लौट आना चाहिए, जो डर, लालच या अन्य किसी कारण से विधर्मी हो गये थे; पर राहुल जी के मुंह से ये बात पहली बार ही सुनी है।

पर इस अपील के साथ ही राहुल गांधी को ये भी सोचना होगा कि आखिर उनका भरापूरा घर छोड़कर लोग गये क्यों ? जब तक इस मूल बीमारी को वे नहीं समझेंगे और इसका निदान नहीं करेंगे, तब तक लोगों का वापस आना तो दूर, घर छोड़कर जाने का क्रम ही बना रहेगा।

सच तो ये है कि कांग्रेस में मूल बीमारी वंशवाद है। मोतीलाल से शुरू होकर जवाहर लाल, इंदिरा गांधी, संजय, राजीव और सोनिया मैडम से होती हुए यह बीमारी अब राहुल गांधी तक आ पहुंची है। इन्हें लगता है कि भले ही भारत में लोकतंत्र हो; पर राज करने का हक उन्हीं को है। इसका सीधा सा अर्थ है कि पार्टी हो या सरकार, नंबर एक की कुर्सी इस परिवार के लिए आरक्षित है। बाकी को नंबर दो या तीन से ही संतोष करना होगा। भले ही वे कितने भी योग्य, चरित्रवान, देशभक्त और पार्टी के लिए समर्पित हों।

कांग्रेस पार्टी में इसके कई उदाहरण हैं। जवाहर लाल नेहरू ने अपने सामने ही अपनी बेटी इंदिरा गांधी को पार्टी अध्यक्ष और मंत्री बना दिया था, जबकि उनसे वरिष्ठ कई लोग मौजूद थे। डा. लोहिया, चरणसिंह, आचार्य कृपलानी, आचार्य नरेन्द्र देव, जयप्रकाश नारायण आदि पहले कांग्रेसी ही थे; पर फिर इनके नेहरू और इंदिरा गांधी से मतभेद हो गये, इनमें वंशवाद एक प्रमुख कारण था। नेहरू और शास्त्री जी के जाने से मोरारजी देसाई आदि की इच्छाएं फिर जाग गयीं। क्योंकि वे भी राजनीति में संन्यासी बनने तो आये नहीं थे; पर कामराज के सहयोग से प्रधानमंत्री बनने पर इंदिरा गांधी ने पुराने लोगों से पिंड छुड़ाने के लिए 1969 में पार्टी ही तोड़ दी। असल में वे अपनी अगली पीढ़ी के लिए कुर्सी सुरक्षित करना चाहती थीं। अतः कई वरिष्ठ लोगों ने कांग्रेस ही छोड़ दी।  

1977 में आपातकाल के बाद मोरारजी प्रधानमंत्री बने; पर पुराने कांग्रेसियों और समाजवादियों ने सरकार नहीं चलने दी। 1980 में फिर सत्ता पाकर इंदिरा गांधी उत्तराधिकारी के नाते अपने छोटे बेटे संजय को आगे बढ़ाने लगीं, जबकि आपातकाल में वे खूब बदनाम हो चुके थे; पर उनके बड़े भाई राजीव राजनीति से दूर रहते थे। अतः इंदिरा जी के पास कोई विकल्प नहीं था; पर 1980 में संजय की मृत्यु के बाद उन्होंने राजीव को जबरन राजनीति में खींच लिया। 1975 से 1988 के बीच इस परिवार के दखल से दुखी होकर चंद्रशेखर, रामधन, कृष्णकांत, मोहन धारिया, नीलम संजीव रेड्डी और फिर विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसे कई जमीनी नेताओं ने कांग्रेस छोड़ दी।

1984 में इंदिरा गांधी की हत्या के बाद यदि राष्ट्रपति जैलसिंह चाहते, तो वे प्रणव मुखर्जी या नारायण दत्त तिवारी जैसे किसी वरिष्ठ नेता को प्रधानमंत्री बना सकते थे; पर वे भी इंदिरा जी के अहसानों से दबे थे। अतः उन्होंने अनुभवशून्य राजीव गांधी को शपथ दिला दी। इससे कांग्रेस फिर उस परिवार की बंधुआ बन गयी। इससे नाराज होकर प्रणव मुखर्जी, अर्जुन सिंह, नारायण दत्त तिवारी आदि ने कांग्रेस छोड़ दी; पर दाल न गलने पर वे फिर गुलामी में लौट आये।

1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद नरसिंहराव प्रधानमंत्री बने। सोनिया जी दुख में डूब गयीं। ऐसा लगा कि अब इस परिवार की काली छाया से कांग्रेस मुक्त हो गयी है; पर सीताराम केसरी के अध्यक्ष काल में मैडम का सत्ता मोह जाग उठा। इसके लिए राजीव के मित्रों का आग्रह था या किसी बाहरी शक्ति का, यह कहना कठिन है; पर यह सच है कि 1998 में सोनिया मंडली ने कांग्रेस कार्यालय में आकर बुजुर्ग केसरी चाचा को अपमानित कर कुर्सी कब्जा ली। कांग्रेस एक बार फिर इस परिवार के दुष्चक्र में फंस गयी।

इसके बाद 18 साल तक कांग्रेस पर सोनिया जी का कब्जा रहा। इस दौरान महाराष्ट्र में शरद पवार और बंगाल में ममता बनर्जी जैसे जनाधार वाले नेता कांग्रेस छोड़ गये। तेजी से उभर रहे राजेश पायलेट 2000 में और माधवराव सिंधिया 2001 में हुई दुर्घटनाओं में मारे गये। पता नहीं यह नियति थी या षड्यंत्र ? 2004 में लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ा दल होने के नाते कांग्रेस के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनी। सोनिया ने जनाधारहीन मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया, जिससे भविष्य में राहुल के लिए कोई बाधा उत्पन्न न हो।

पिछले तीन साल से बीमार मम्मीश्री तो नाममात्र की अध्यक्ष थीं। राहुल ही कांग्रेस के सर्वेसर्वा थे। सभी निर्णय वही लेते थे। तब भी नेताओं के कांग्रेस छोड़ने का क्रम जारी रहा। हेमंत बिस्व शर्मा पूर्वोत्तर भारत में कांग्रेस के बड़े नेता थे; पर कई बार आग्रह के बाद भी राहुल ने उन्हें मिलने का समय नहीं दिया। जब मिले, तब भी बात सुनने की बजाय वे अपने कुत्ते से खेलते रहे। इससे अपमानित होकर हेमंत ने कांग्रेस छोड़ दी और आज असम में भा.ज.पा. की सरकार है। अब वे शेष राज्यों में कांग्रेस को उखाड़ने में लगे हैं।

इस परिवार द्वारा लोगों का अपमान आम बात है। संजय इस मामले में कुख्यात थे। 1982 में राजीव गांधी ने हैदराबाद में हवाई अड्डे पर आंध्र के मुख्यमंत्री टी.अंजैया को डांटा था। 1987 में प्रधानमंत्री रहते हुए उन्होंने प्रेस वार्ता में ही विदेश सचिव श्री वेंकटेश्वरन को हटा दिया था। अंग्रेजी न जानने के कारण उन्होंने जैलसिंह को कई बार अपमानित किया। नरसिंह राव की मृत्यु के बाद मैडम जी ने उनका अंतिम संस्कार दिल्ली में नहीं होने दिया। हैदराबाद में भी शवदाह का ठीक प्रबंध नहीं किया गया। 

ऐसे माहौल में ‘घर वापसी’ की अपील का क्या अर्थ है ? शरद पवार, ममता बनर्जी, नवीन पटनायक आदि पुराने कांग्रेसी हैं। इनका अपने राज्यों में भारी जनाधार भी है, जबकि राहुल की जड़ें किसी राज्य में नहीं है। वे जहां से सांसद हैं, उस उ.प्र. में उन्हें पिछले चुनाव में अखिलेश यादव की साइकिल पर बैठने के बावजूद सात सीट मिली हैं। ऐसे में क्या वे या उनकी मम्मी किसी पुराने और जमीनी नेता को कांग्रेस का अध्यक्ष या भावी प्रधानमंत्री पद का प्रत्याशी बनाएंगे ?

यह प्रश्न किसी से भी पूछें, उत्तर नकारात्मक ही होगा। लोकतंत्र विरोधी जिस गंदी परम्परा को मोतीलाल नेहरू ने शुरू किया था, उसे राहुल नहीं छोड़ सकते। ऐसे में ‘घर वापसी’ की ये अपील एक ढकोसला मात्र है।

गुरुवार, 22 फ़रवरी 2018

मीडिया का बदलता रूप

हिन्दी शब्द ‘माध्यम’ से अंग्रेजी में ‘मीडियम’ और मीडिया बना। एक जगह की बात या घटना को दूसरी जगह पहुंचाने में जो व्यक्ति या उपकरण माध्यम बनता है, वही मीडिया है। सृष्टि के जन्मकाल से ही किसी न किसी रूप में मीडिया का अस्तित्व रहा है और आगे भी रहेगा।

भारतीय दृष्टिकोण से यदि देखें, तो हमारे यहां नारद जी पहले पत्रकार हैं। इसीलिए उनकी जयंती (ज्येष्ठ कृष्ण 2) वास्तविक ‘पत्रकारिता दिवस’ है। 30 मई को देश भर में ‘हिन्दी पत्रकारिता दिवस’ मनाया जाता है। चूंकि 1826 में इस दिन श्री जुगल किशोर शुक्ल ने कोलकाता से हिन्दी का पहला साप्ताहिक अखबार ‘उदन्त मार्त्तण्ड’ शुरू किया था। उस दिन नारद जयंती ही थी। यद्यपि अर्थाभाव में यह 11 दिसम्बर 1827 को बंद हो गया; पर पत्रकारिता के इतिहास में नारद जयंती को पुनर्जीवित कर गया। 

कहते हैं कि नारद जी की पहुंच देव, गंधर्व, नाग आदि लोकों से लेकर आकाश और पाताल तक थी। वे अपनी वीणा लेकर ‘नारायण-नारायण’ करते हुए हर उस जगह पहंुच जाते थे, जहां उनकी जरूरत होती थी। दुर्भाग्य से हमारी फिल्मों और दूरदर्शन ने उनकी छवि एक जोकर और यहां-वहां आग लगाने वाले व्यक्ति की बनायी है। जबकि वे लोकहितकारी पत्रकार थे। उनके सामने जनता का हित सर्वोपरि रहता था।

श्रीकृष्ण के जन्म का ही उदाहरण लें। अपनी बहिन देवकी को ससुराल छोड़ने जाते समय हुई भविष्यवाणी से चिंतित होकर कंस ने देवकी ओर वसुदेव को जेल में बंद कर दिया। इसके बाद वह देवकी की आठवीं संतान की प्रतीक्षा करने लगा। नारद जी जानते थे कि जब तक कंस के पाप का घड़ा नहीं भरेगा, तब तक जनता में विद्रोह नहीं होगा। इसलिए वे आठ पंखुड़ी वाला कमल लेकर कंस के पास गये और उसकी आठवीं पंखुड़ी पहचानने को कहा। इससे कंस भ्रमित हो गया। उसने अपनी दुष्ट मंडली से पूछा, तो सबने देवकी के सभी बच्चों को मारने की सलाह दी। कंस ने ऐसा ही किया।

लेकिन इससे लोगों में आक्रोश बढ़ता गया और सबने तय कर लिया कि चाहे जो हो, पर आठवीं संतान को बचाना ही है। इसलिए श्रीकृष्ण के जन्म लेते ही जेल के पहरेदार, लुहार आदि ने उनके निकलने का प्रबंध कर दिया। नाव वालों ने ऐसी मजबूत नाव बनायी, जो दूर से शेषनाग जैसी दिखती थी और उससे श्रीकृष्ण को उफनती यमुना पार करा दी गयी। फिर इसी तरह गोकुल से देवकी की नवजात कन्या को ले भी आये। इसके बाद कंस को सूचना दी गयी। यह कथा नारद जी की बुद्धिमत्ता और योजकता को बताती है। 

कोई कह सकता है कि नारद जी हर युग और काल में कैसे हो सकते हैं ? वस्तुतः नारद जी कोई व्यक्ति न होकर एक संस्था या उसके पदाधिकारी थे, जैसे आजकल प्राचार्य, अध्यक्ष या मुख्यमंत्री आदि होते हैं। इसलिए नारद जी आज भी हैं और आगे भी रहेंगे।

सत् और त्रेता के बाद द्वापर युग आता है। तब विज्ञान बहुत उन्नत था। इसीलिए कुरुक्षेत्र में हुए महाभारत का आंखों देखा हाल संजय ने हस्तिनापुर में बैठे धृतराष्ट्र को सुनाया था। अर्थात तब भी दूरदर्शन जैसा कोई उपकरण अवश्य रहा होगा। महाभारत का युद्ध 5,156 साल पहले हुआ था। उसमें विज्ञान की समूची प्रगति दांव पर लग गयी थी। इससे विश्व की अधिकांश जनसंख्या और विज्ञान भी नष्ट हो गया। 

लेकिन मीडिया की जरूरत फिर भी बनी रही। कभी कबूतर, घोड़े या ऊंट सवारों से संदेशवाहकों का काम लिया जाता था। कहते हैं कि 1761 में हुए पानीपत के तीसरे युद्ध में मराठा सेना की पराजय का समाचार एक महीने बाद महाराष्ट्र पहुंच सका था। पर्वत और वनों में ढोल की थाप से संदेश पहुंचाए जाते थे। ‘ढोल सागर’ नामक गं्रथ में इसकी जानकारी मिलती है, यद्यपि अब उसका बहुत कम भाग ही उपलब्ध है। 

अंग्रेजों ने भारत में 1850 में टेलिफोन की तारें लगायीं। इससे कहीं भी हुए सैन्य विद्रोह की सूचना तुरंत देश भर में पहुंच जाती थी। 1857 में कोलकता की बैरकपुर छावनी और फिर कुछ दिन बाद मेरठ छावनी में विद्रोह हुआ। टेलिफोन से इसकी सूचना सब छावनियों में पहुंच गयी और वहां कार्यरत भारतीय सैनिकों से हथियार ले लिये गये। यह कमाल टेलिफोन का ही था। इसीलिए भारतीय स्वाधीनता सेनानी हर जगह सबसे पहले टेलिफोन की तारें काटते थे। 

इन तारों से टेलिग्राम भी होते थे। 1854 में इसकी व्यावसायिक सेवाएं शुरू हुईं। 1902 में ये वायरलैस हो गया; पर एक समय पत्रकार इसी से लिखित समाचार अखबारों को भेजते थे। पुरानी पड़ जाने से 2013 में यह सेवा बंद कर दी गयी। इसी में से फिर टेलिप्रिंटर का जन्म हुआ, जो अखबारों के लिए अनिवार्य चीज थी। हर समाचार एजेंसी के अपने टेलिप्रिंटर होते थे। ‘भाषा’ भारत की तथा ‘रायटर्स’ विश्व की प्रमुख एजेंसी है। पहले केवल अंग्रेजी टेलिप्रिंटर ही थे; पर फिर हिन्दुस्थान समाचार ने हिन्दी टेलिप्रिंटर बना लिया। इसके बाद फैक्स मशीन आ गयी। कम्प्यूटर, मोबाइल और ई.मेल के दौर में अब वह भी पुरानी हो गयी है। 

एक समय केवल प्रिंट मीडिया ही था; पर फिर टी.वी. आ गया। चूंकि दृश्य सदा लिखित सामग्री से अधिक प्रभावी होता है। कबीर दास जी ने भी ‘आंखों देखी’ को ‘कागद की लेखी’ से अधिक महत्व दिया है। अब घर के टी.वी. से आगे मोबाइल टी.वी. और सोशल मीडिया आ गया है। इसके आगे क्या होगा, कहना कठिन है। हो सकता है पोलियो की तरह बच्चों को मीडिया का भी टीका लगा दिया जाएगा। फिर न टी.वी. की जरूरत होगी और न मोबाइल या इंटरनेट की। विज्ञान जो न कराए वह थोड़ा ही है। 

कहते हैं कि विज्ञान का हर नया उपकरण पुराने को बाहर कर देता है; लेकिन इसके बावजूद एक चीज कभी बाहर नहीं हुई और होगी भी नहीं। वह है पत्रकार। क्योंकि मशीन कितनी भी उन्नत हो जाए; पर उसे चलाता तो आदमी ही है। इसलिए पत्रकार का ठीक रहना जरूरी है। उसकी वैचारिक प्रतिबद्धता चाहे जो हो; पर समाचार के साथ विचार का घालमेल ठीक नहीं है। एक ही सभा की रिपोर्ट करते समय एक संवाददाता फोटो में खाली कुर्सियों वाला क्षेत्र दिखाता है, तो दूसरा भरी हुई। कई संवाददाता किसी से सुनकर समाचार छाप देते हैं। कुछ लोग जानबूझ कर विवाद खड़ा कर देते हैं। इससे पत्रकार और अखबार दोनों की छवि खराब होती है। इससे बचना ही उचित है। चंूकि मीडिया जगत में विश्वसनीयता सबसे बड़ी चीज है।

किसी समय पत्रकारिता का अर्थ समाचार संकलन ही होता था; पर अब खेल, सिनेमा, फोटो, साहित्य, थाना, कोर्ट, राजनीतिक व सामाजिक संस्थाओं के लिए भी अलग-अलग संवाददाता होते हैं। विधा चाहे जो हो, पर पत्रकार के लिए खूब पढ़ना और भाषा पर अधिकार जरूरी है। गलत तथ्य देना अपराध ही नहीं, पाप भी है। ऐसा कहते हैं कि किसी समय मीडिया मिशन था; पर अन्य क्षेत्रों की तरह यहां भी गिरावट आयी है। अतः वह कमीशन से होते हुए सेंसेशन तक पहुंच गया है; लेकिन हजारों पत्रकार आज भी निष्ठा से काम कर रहे हैं। इसीलिए बदलते समय के साथ मीडिया का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है।

शनिवार, 13 जनवरी 2018

कोरेगांव विवाद और जातिभेदी राजनीति

नया वर्ष चाहे अंग्रेजी हो या भारतीय; पर उत्सवप्रिय भारतीय उसे जोरशोर से मनाते हैं। लेकिन 2018 का प्रारम्भ एक कटु विवाद के साथ हुआ है। वह है पुणे के पास कोरेगांव में एक युद्ध की 200 वीं वर्षगांठ पर हुआ जातीय संघर्ष। एक जनवरी, 1818 के इस युद्ध के बारे में सबका अपना-अपना दृष्टिकोण है; पर यह निश्चित है कि इससे भारत में अंग्रेजों की जड़ें मजबूत हुईं। यद्यपि 1757 में हुए पलासी के युद्ध में जीत से उनका प्रभाव तो बढ़ ही गया था; पर कोरेगांव की यह लड़ाई निर्णायक सिद्ध हुई।

एक समय सिक्खों की तरह मराठे भी भारत की प्रमुख शक्ति थे। 1760-61 में पानीपत की लड़ाई हुई। उसमें अहमद शाह अब्दाली से पराजय के बाद यह शक्ति कमजोर होकर महाराष्ट्र तक ही सिमट गयी। कोरेगांव की लड़ाई भी उन्होंने गिरे हुए मनोबल से लड़ी थी। वहां हुए पराभव से यह शक्ति स्थायी रूप से कुंठित हो गयी और अंग्रेजी राज प्रबल हो गया। इससे मराठों के साथ ही अन्य बड़े राजाओं की हिम्मत भी टूट गयी। फिर उन्होंने अंग्रेजों से सीधा संघर्ष नहीं किया। यद्यपि झांसी की रानी लक्ष्मीबाई से लेकर गढ़मंडल की रानी अवन्तीबाई जैसे अपवाद भी हैं। अधिकांश छोटे राजे, रजवाड़ों और जमीदारों ने भी अंग्रेजों का मुकाबला किया। जनजातीय (वनवासी) समूहों ने भी अपनी सीमित शक्ति और परम्परागत हथियारों के बलपर डटकर मुकाबला किया; पर बड़ों ने एक बार कंधे झुकाये, तो फिर वे झुके ही रहे।

उन दिनों महाराष्ट्र में शिवाजी के वंशज अर्थात क्षत्रिय मराठों का शासन था; पर वास्तविक शक्ति उनके प्रधानमंत्री अर्थात पेशवा के हाथों में थी। ये पेशवा मराठी ब्राह्मणों के चितपावन गोत्र से होते थे। राजकाज का केन्द्र पुणे का शनिवार बाड़ा था। शिवाजी के पौत्र छत्रपति शाहू जी के मन में समाज के दुर्बल और निर्धन वर्ग के प्रति बहुत प्रेम था। उन्होंने ही सबसे पहले अपने राज्य में आरक्षण व्यवस्था लागू की थी। इसलिए इन वर्गों में प्रभाव रखने वाले नेता और दल उन्हें बहुत मानते हैं। मायावती ने उ.प्र. में मुख्यमंत्री बनने पर लखनऊ के किंग जार्ज मैडिकल कॉलिजके बाहर शाहू जी की भव्य धातु प्रतिमा लगवाकर उसका नाम छत्रपति शाहू जी महाराज मैडिकल कॉलिजकर दिया था। 

लेकिन शाहू जी के उत्तराधिकारी इतने उदार नहीं थे। पेशवाओं के मन में भी निर्धन वर्ग के प्रति कोई प्रेम और सम्मान नहीं था। कहते हैं कि उन्हें अपनी कमर में झाड़ू बांधकर तथा गले में थूक के लिए लोटा लटकाकर चलना पड़ता था। इसलिए वे क्षत्रिय मराठों और ब्राह्मण पेशवाओं से घृणा करने लगे। ये लोग भी शरीर और स्वभाव से वीर थे। शाहू जी के समय तक इन्हें सेना में लिया जाता था; पर फिर यह बंद हो गया।

अब उनके पास न शिक्षा थी, न व्यापार और न ही खेती। अतः उनके सामने खाने-कमाने और अपने परिवार को पालने की बड़ी समस्या आ गयी। अंग्रेजों की नीति सदा बांटों और राज करोकी रही है। उन्होंने इस मजबूरी का लाभ उठाने के लिए सेना में महार रेजिमेंटबना दी। अतः इन वर्गों के युवक फौज में भर्ती होने लगे। इस प्रकार अंग्रेजों ने इनके मन में शासक वर्ग के प्रति भरी घृणा को एक संगठित रूप दे दिया।

उन दिनों नियमित सेनाएं बहुत कम होती थीं। युद्ध की स्थिति में राजा की ओर से मुनादी होने पर इच्छुक लोग सेना में भर्ती हो जाते थे। पड़ोसी राज्यों या देशों से भी लोग आ जाते थे। उनका मुख्य उद्देश्य धनलाभ ही होता था। जो राजा या जमींदार उन्हें भरती कर ले, वे उसके लिए ही लड़ते थे। युद्ध में घायल या मृत्यु होने पर खेती की जमीनें दी जाती थीं। लूट में भी कुछ हिस्सा मिल जाता था। युद्ध के बाद सैनिकों को गांव और बिरादरी में सम्मान मिलता था। नियमित सेना की प्रथा भारत में विदेशियों की देखादेखी ही आयी है।

कोरेगांव युद्ध में मराठा सेना के अग्रणी दस्ते में अधिकांश अरबी मुसलमान थे। उस सेना में महाराष्ट्र के अन्य निर्धन वर्ग के हिन्दू भी थे। अंग्रेजों की सेना में महारों के साथ ही बंगाल और मद्रास के निर्धन वर्गों के लोग भी थे। मालिकों के नजरिये से ये मराठों और अंग्रेजों का, जबकि सैनिकों के नजरिये से ये महारों और मुसलमानों का युद्ध था। अंग्रेज अपनी सत्ता स्थायी करने के लिए चाहते थे कि जातिभेद के ये बीज पेड़ बन जाएं। इसलिए उन्होंने वहां एक स्मारक बना दिया। उसमें 27 महार और 22 अन्य (कुल 49) सैनिकों के नाम लिखे हैं।

तुलसी बाबा ने कहा है, ‘‘जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।’’ इसीलिए सब इस युद्ध को अपने-अपने चश्मों से देख रहे हैं; पर यह निर्विवाद है कि इसमें अंग्रेज जीते और भारत की हानि हुई। अतः इसे किसी जाति, वर्ग या समुदाय की जीत कहना उचित नहीं है।

कैसा दुर्भाग्य है कि अंग्रेजों के जाने के 70 साल बाद भी हम जातियों के नाम पर लड़ रहे हैं। जातिवाद को मिटाना आसान नहीं है; पर हम जातिभेद को तो मिटा ही सकते हैं। जन्म के कारण किसी को ऊंचा या नीचा मानना केवल अपराध ही नहीं, पाप भी है। इस मिटाने के लिए हमें अपनी चुनाव प्रणाली बदलनी होगी। क्योंकि यह जातिभेद को हिंसक जातीय संघर्ष की ओर बढ़ा रही है। 1947 के बाद का परिदृश्य इसका गवाह है। कोरेगांव विवाद को बढ़ाने के पीछे भी भारतद्वेषी गुटों की राजनीति ही है, और कुछ नहीं।

गुरुवार, 11 जनवरी 2018

मकर संक्रांति और पानीपत का युद्ध

मकर संक्रांति के साथ जुड़ें प्रसंगों में सबसे महत्वपूर्ण है 1761 ई. में हुआ पानीपत का युद्ध। यद्यपि इसमें मराठा सेनाएं हार गयीं; पर उसके बाद पश्चिम से कोई शत्रु दिल्ली तक नहीं आ सका। विजयी अहमदशाह अब्दाली ने भी वापस काबुल जाने में ही अपनी खैर समझी। यह युद्ध महाराष्ट्र नहीं, बल्कि दिल्ली की रक्षार्थ हुआ था। युद्ध से पूर्व अब्दाली ने सदाशिव भाऊ को संदेश भेजा था कि यदि वे पंजाब को सीमा मान लें, तो वह सन्धि को तैयार है; पर भाऊ ने इसे यह कहकर ठुकरा दिया कि भारत की सीमा अटक तक है।

छत्रपति शिवाजी के पौत्र शाहूजी के पेशवा बाजीराव ने दक्षिण में अर्काट तथा फिर बंगाल, बिहार, उड़ीसा में विजय प्राप्त की। 40 वर्ष की अल्पायु में उनकी मृत्यु से इस अभियान को धक्का लगा। अतः नेपाल और यमुना के मध्य क्षेत्र पर रोहिले और पठान काबिज हो गये। 1747 में नादिरशाह की हत्या के बाद उसका सहयोगी अहमदशाह अब्दाली अफगानिस्तान का अमीर बन गया। 

बाजीराव के बाद उनके 19 वर्षीय पुत्र नानासाहब पेशवा बने। उनके नेतृत्व में मराठों ने 1750 में पठानों और रोहिलों को हराया तथा मुल्तान, सिन्ध, पंजाब, राजपूताना, रुहेलखंड आदि की चैथ वसूली के अधिकार प्राप्त कर लिये। इससे चिंतित नजीबुद्दौला, बेगम मलका जमानी और मौलवी वलीउल्लाह ने ‘इस्लाम खतरे में’ कहकर नवाबों, निजाम और जमीदारों से सम्पर्क किया। अहमदशाह अब्दाली को भी पत्र लिखकर भारत में ‘दारुल इस्लाम’ की स्थापना को कहा। उन्होंने लिखा कि मराठा, जाट और सिखों को हराने का निर्णय ‘जन्नत की अदालत’ में हुआ है। दिल्ली की मुगल सल्तनत मराठों के हाथ का खिलौना है। अतः वे इसे नष्ट करें और नादिरशाह की तरह वापस जाने की बजाय यहीं राज्य करें। 

अब्दाली निमन्त्रण पाकर भारत की ओर बढ़ने लगा; पर हर बार उसे पंजाब ने टक्कर दी। 1744 से 1750 तक उसने पांच बार हमला किया। ऐसे में जब मराठों ने दिल्ली के मुगल दरबार की नाक में नकेल डाली, तो सिख बहुत खुश हुए। रघुनाथराव पेशवा के नेतृत्व में मराठा सेना जब पंजाब पहुंची, तो शालीमार बाग (लाहौर) में भव्य स्वागत समारोह हुआ। 

1753-54 में अब्दाली ने दिल्ली तक आकर मराठों को पीछे हटा दिया। यह सुनकर रघुनाथराव पेशवा पुणे से चल दिये। उन्होंने शिन्दे तथा होल्कर के साथ दिल्ली पर कब्जा कर अपनी मर्जी से राजा, वजीर तथा सेनापति बनाये। इससे नाराज होकर राजा सूरजमल मल्हारराव होल्कर से भिड़ गये; पर दूरदर्शी रघुनाथराव ने उनसे सन्धि कर आगरा तथा निकटवर्ती क्षेत्र पर उनके अधिकार को पूर्ववत मान लिया।

रघुनाथराव के वापस होते ही 1756 में अब्दाली फिर आ गया। होली के दो दिन बाद (1.3.1757) उसने मथुरा में तीर्थयात्रियों के खून से होली खेली। सूरजमल के पुत्र जवाहरसिंह ने उससे टक्कर ली। 2,000 सशस्त्र नागा साधुओं सहित 10,000 हिन्दू तथा 20,000 अफगानी मारे गये। अब्दाली ने आगरा पर हमलाकर सूरजमल से जुर्माना वसूलने का विफल प्रयास भी किया। इसी समय फैले हैजे से उसके सैनिक मरने लगे। अतः दिल्ली में गद्दी पर अपने मोहरे बैठाकर वह काबुल लौट गया।

यह सुनकर रघुनाथराव फिर उत्तर भारत की ओर आये। उन्होंने मेरठ, सहारनपुर, रोहतक और दिल्ली पर कब्जाकर अपनी पसंद के लोग सत्ता में बैठाये। फिर वे पंजाब गये और पटियाला राज्य के सेनापति आलासिंह जाट के साथ सरहिन्द को जीता। इस युद्ध में हजारों अफगान सैनिक मरे। अब्दाली द्वारा नियुक्त अधिकारी काबुल भाग गये। रघुनाथराव ने अटक तक भगवा झंडा फहरा दिया। 

अब्दाली का प्रतिनिधि नजीबुद्दौला भयवश मराठों की जी-हुजूरी करने के साथ ही बेगम मलका जमानी तथा मौलवी वलीउल्लाह के साथ बार-बार अब्दाली को फिर भारत आने को पत्र लिख रहा था। उसने मराठों के प्रतिनिधि दत्ताजी शिन्दे को बंगाल विजय के लिए प्रेरित कर उनकी सेना को वर्षाकाल में उफनती गंगा और यमुना के बीच फंसा दिया। इधर अब्दाली भी दिल्ली की ओर चल दिया था। दत्ताजी की सेनाएं बुराड़ी-जगतपुर (वर्तमान दिल्ली) में थी। इस प्रकार वे नजीब और अब्दाली की सेनाओं के बीच घिर गये। वे इस धोखे से बहुत नाराज थे और नजीब को दंड देना चाहते थे। अतः उन्होंने पूरी ताकत से हमला बोल दिया।

10 जनवरी, 1760 को हुए युद्ध में नजीब की सहायता को कुतुबशाह और अहमदखान बंगश भी आ गये। दत्ताजी को गोली लगी और वे घोड़े से गिर पड़े। इस पर कुतुबशाह हाथी से उतरकर बोला, ‘‘क्यों पटेल, मुसलमानों से फिर लड़ोगे ?’’ निडर दत्ताजी ने उत्तर दिया, ‘‘हां, बचेंगे तो और भी लड़ेंगे।’’ कुतुबशाह ने काफिर कहकर लात मारी और उनका सिर काटकर अब्दाली को भेंट करने ले गया। युद्ध में दत्ताजी ने भले ही वीरगति पाई; पर उनका वीर वाक्य ‘‘हां, बचेंगे तो और भी लड़ेंगे’’ महाराष्ट्र के घर-घर में गूंज गया।

यह समाचार पुणे पहुंचने पर सदाशिवराव भाऊ तथा नानासाहब पेशवा के बड़े पुत्र विश्वासराव के नेतृत्व में सेना को इधर भेजा गया। भाऊ ने उत्तर के हिन्दू राजे-रजवाड़ों तथा मुस्लिम सूबेदारों, नवाबों आदि को पत्र लिखकर विदेशी अब्दाली के विरुद्ध सहयोग मांगा; पर कोई साथ नहीं आया। उधर नजीबखान, लखनऊ के नवाब नासिरुद्दौला, फरुखाबाद-बरेली के अहमदखान बंगश, पीलीभीत के मीरबेग आदि ने कुरान के सामने कसम ली कि वे दिल्ली की सत्ता दक्षिण (अर्थात मराठों) के पास नहीं जाने देंगे। 

दत्ताजी के निधन से बिखरी मराठा सेना सदाशिव और विश्वासराव के आने की खबर सुनकर फिर एकत्र होने लगी। सूरजमल भी इनके साथ आ गये। उन्होंने एक अगस्त, 1760 को फिर दिल्ली जीत ली। कुछ दिन बाद मराठा छावनी में ‘श्रीमंत विश्वासराव पेशवा का दरबार’ आयोजित हुआ। अब्दाली उन दिनों अनूपशहर तथा शुजाउद्दौला यमुना पार छावनी डाले था। वर्षाकाल के कारण युद्ध संभव नहीं था। अतः दोनों पक्ष सर्दी की प्रतीक्षा करने लगे।

दरबार की सूचना पाकर मौलवी वलीउल्लाह तथा नजीबुद्दौला ने मुसलमानों से इस हिन्दू राज्य को मिटाने का आह्नान किया। कुछ मुस्लिम जागीरदार मराठों के साथ भी थे। इससे नाराज होकर सूरजमल वापस भरतपुर चले गये। यद्यपि पानीपत के युद्ध तक तथा उसके बाद भी उन्होंने शस्त्र, अन्न, वस्त्र व नकद राशि से मराठों की सहायता की। उनकी रानी किशोरी ने इसमें विशेष रुचि ली।

मौसम ठीक होते ही भाऊसाहब ने हमला कर दिया। कुंजपुरा के युद्ध में कुतुबशाह, अब्दुल समदखान और किलेदार निजाबत खान पकड़े गये। भाऊसाहब ने दत्ताजी का बलिदान याद कर कुतुबशाह और समदखान के कटे सिर अब्दाली को भेज दिये। इससे क्रुद्ध अब्दाली पानीपत आ गया। भाऊसाहब भी एक नवम्बर, 1760 को वहां पहुंच गये। 22 नवम्बर को जनकोजी शिन्दे ने हमला किया। इसमें अब्दाली की भारी क्षति हुई। इसके जवाब में सात दिसम्बर (अमावस्या) की रात में अब्दाली ने हमला बोला। इसमें भी मराठों की जीत हुई; पर सेनापति बलवन्तराव मेहन्दले मारे गये। पति के शव के साथ उनकी पत्नी रात में ही चिता पर चढ़ गयी।

इन दोनों युद्धों की क्षति से अब्दाली चिंतित हो गया। उधर मराठे भी राशन और रसद के अभाव तथा ठंड से परेशान थे। भाऊसाहब ने 14 जनवरी, 1761 को प्रातः दस बजे हमला किया। तोपों की मार से विरोधियों को धकेलते हुए वे दिल्ली की ओर बढ़ने लगे। इससे चिंतित अब्दाली ने अपनी बेगमों को हटाने के लिए घोड़े तैयार कराये तथा भागते सैनिकों को साहस दिलाकर फिर आगे भेजा। 

इसी बीच मराठा तोपखाने का नायक इब्राहिम खान गारदी तथा गोली लगने से घोड़े पर सवार विश्वासराव मारे गये। इससे सेना में भगदड़ मच गयी। सैनिकों को उत्साह दिलाने के लिए दोनों हाथों में तलवार लेकर सेनापति भाऊ शत्रुओं में घुस गये। इसी समय अब्दाली ने अपने सुरक्षित 6,000 ऊंटसवार बंदूकधारी सैनिक भेज दिये। उन्हांेने ढूंढ-ढूंढकर भाऊ, जनकोजी शिन्दे, तुकोजी शिन्दे आदि को मार डाला। इससे मराठे नेतृत्वविहीन हो गये और अब्दाली जीत गया।

इस युद्ध में लगभग 50,000 मराठा सैनिक तथा इतने ही अन्य लोग मारे गये। महाराष्ट्र का कोई परिवार ऐसा नहीं था, जिसने अपना कोई परिजन न खोया हो। जीत के बावजूद अब्दाली की हिम्मत टूट गयी और वह काबुल लौट गया। विजेता होने पर भी उसने वहां से अनेक उपहारों के साथ अपना दूत पुणे की राजसभा में सन्धिवार्ता हेतु भेजा। 

इस युद्ध का एक कटु और दुःखद सत्य यह है कि मराठों का साथ देने की बजाय राजस्थान के रजवाड़े अब्दाली की जीत से प्रसन्न हुए। सूरजमल युद्ध से अलग तो रहे; पर इसके परिणाम से वे भी दुखी हुए। एक विद्वान ने लिखा है कि यदि यह युद्ध न होता, तो 1947 के बाद दिल्ली भारत की बजाय पाकिस्तान की राजधानी होती। ऐसे में आज भी यह निर्णय करना कठिन है कि इस युद्ध का वास्तविक विजेता कौन था ?

मंगलवार, 2 जनवरी 2018

सुधार अंदर से ही होता है

दुनिया का कोई भी धर्म, मत, पंथ, सम्प्रदाय, मजहब, समाज, संस्था या संगठन ऐसा नहीं है, जिसमें समय के अनुसार कुछ सुधार या परिवर्तन न हुआ हो। कुछ में यह स्वाभाविक रूप से हुआ, तो कुछ में भारी खून खराबे के बाद। स्थिरता और जड़ता मृत्यु के प्रतीक हैं, तो परिवर्तन जीवन का। इसीलिए परिवर्तन को प्रकृति का नियम कहा गया है। 

पिछले दिनों भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण घटना घटी है। मुसलमानों के एक बड़े वर्ग में एक साथ तीन तलाक कहकर अपनी बीवी को छोड़ देने की कुरीति प्रचलित है। इसे ‘तलाक ए बिद्दत’ कहते हैं। अब मुंह से बोलने की बजाय फोन या चिट्ठी से भी यह काम होने लगा है। यद्यपि दुनिया के कई देश इसे छोड़ चुके हैं; पर भारत के मुसलमान अभी लकीर के फकीर ही बने हैं। उनके मजहबी नेता कहते हैं कि अल्ला के बनाए कानून में फेरबदल नहीं हो सकती; पर वे इस पर चुप रहते हैं कि यदि ये अल्ला का कानून है, तो मुस्लिम देशों ने इसे क्यों छोड़ दिया; क्या वहां के मुसलमान और उनके नेता मूर्ख हैं ? इसलिए किसी मुस्लिम विद्वान ने ठीक ही कहा है कि ये अल्ला का नहीं, मुल्ला का कानून है, जिसकी व्याख्या हर मुल्ला अपने हिसाब से कर देता है। 

भारत में लाखों महिलाएं इस कुप्रथा की शिकार होकर बच्चों के साथ धक्के खा रही हैं। उनकी पीड़ा को अब तक किसी ने नहीं समझा। बरसों पहले इंदौर की 62 वर्षीय वृद्धा शाहबानो का प्रकरण हुआ था। न्यायालय ने उसके पति को आदेश दिया कि वह शाहबानो को गुजारा भत्ता दे। इस पर मुसलमानों ने आसमान सिर पर उठा लिया। उन दिनों राजीव गांधी प्रधानमंत्री थे। इंदिरा गांधी की हत्या से मिली सहानुभूति के कारण उन्हें लोकसभा में 3/4 बहुमत मिला था। इसके बावजूद वे मुसलमानों के शोर से डर गये और इसके विरुद्ध कानून बनवा दिया। इससे मुसलमान महिलाओं का मनोबल गिर गया। उन्होंने इस जलालत को अपनी नियति मान लिया; पर अंदर ही अंदर आग सुलगती रही। इसके बाद कई सरकारें आयीं; पर किसी में इस विषय को छेड़ने की हिम्मत नहीं हुई। 

कहते हैं कि 12 साल में घूरे के भी दिन फिरते हैं; लेकिन मुसलमान महिलाओं के दिन फिरने में 40 साल गये। 2014 में नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बने। मोदी ऊपर से भले ही कठोर दिखते हों; पर अंदर से वे बहुत ही संवेदनशील हैं। उन्होंने मुस्लिम महिलाओं की इस पीड़ा को समझा। इसी का परिणाम है कि लोकसभा में यह प्रस्ताव पारित हो गया है। अब राज्यसभा की बारी है। यद्यपि वहां भा.ज.पा. और रा.ज.ग. की संख्या कम है; पर जैसे कांग्रेस ने लोकसभा में साथ देकर अपनी पुरानी गलती मानी है, आशा है वह राज्यसभा में भी ऐसा ही करेगी। 

इस कानून के बनने से भारत के मुस्लिम समाज का बहुत भला होगा। इससे महिलाओं और समझदार पुरुषों का आत्मविश्वास जगेगा कि यदि वे प्रयास करते रहें, तो सफलता मिलती ही है। यद्यपि पिछली बार की तरह इस बार भी कुछ मुल्ला और उनके समर्थक शोर मचा रहे हैं; पर अब उन्हें सुनने को कोई तैयार नहीं है। क्योंकि अब मुस्लिम समाज के अंदर से ही परिवर्तन की आवाज उठी है। शासन तो बाहर से उसे समर्थन दे रहा है। पिछली बार ऐसा नहीं था। तब शाहबानो अकेली पड़ गयी थी और शासन भी मुल्लाओं के तलवे चाटने वाला था। अतः समाज सुधार का यह प्रयास सफल नहीं हो सका।

सच तो यह है कि समाज सुधार की आवाज जब तक समाज के अंदर से नहीं उठती, तब तक शासन कुछ खास नहीं कर सकता। केवल कानून से कुछ नहीं होता। भारत में कानून तो दहेज, बाल विवाह और भ्रूण हत्या के विरुद्ध भी हैं। फिर भी ये हो रहे हैं। क्योंकि समाज अभी इसे मानने को तैयार नहीं है। कानून तो तब काम करता है, जब कोई उसके विरुद्ध खड़ा हो। यदि बहुमत कुरीति के पक्ष में हो, तो आसानी से कोई विरोध का साहस भी नहीं करता।

इसलिए यह बड़े हर्ष की बात है कि इस बार जहां एक ओर मुस्लिम महिलाएं ताल ठोक कर खड़ी हैं, वहां बड़ी संख्या में मुसलमान पुरुष भी उनका साथ दे रहे हैं। शिया तो खुलकर इस कुप्रथा के विरोध में हैं। अब केवल सुन्नी बचे हैं। शासन और समाज का दबाव जैसे-जैसे बढ़ेगा, उन्हें भी अक्ल आ जाएगी। आखिर अयोध्या के श्रीराममंदिर विवाद पर भी वे पीछे हट ही रहे हैं। वे समझ गये हैं कि न्याय और जनमत दोनों उसके विरुद्ध है। अतः इज्जत से पीछे हटने में ही समझदारी है। यही बात तीन तलाक की कुप्रथा के साथ होगी। 

इस्लाम चूंकि एक मजहब है। इसलिए वहां कोई भी परिवर्तन आसान नहीं है। यद्यपि मजहब तो ईसाई भी है; पर शिक्षा के प्रसार से उनकी सोच बदली है। आशा है इस प्रकरण से शिक्षा लेकर अब समझदार मुसलमान आगे आकर उन मजहबी नेताओं को ठुकराएंगे, जो उन्हें कूपमंडूक बनाए रखना चाहते हैं। चूंकि इसी से उनकी राजनीतिक दुकान चलती है। 

एक बार परिवर्तन और समाज सुधार की लहर चली, तो वह कब और कैसे आंधी बन जाएगी, पता ही नहीं लगेगा। अभी तो प्रस्ताव केवल लोकसभा में ही पारित हुआ है। कानून बनने की मंजिल अभी काफी दूर है; पर अभी से बहुविवाह, बुर्का, हलाला, और कुर्बानी जैसी कुप्रथाओं के विरुद्ध मुसलमान बोलने लगे हैं। आशा है उनकी यह मुहिम भी शीघ्र पूरी होगी। चूंकि कोई भी सुधार तभी होता है, जब उसकी शुरुआत अंदर से हो है। तीन तलाक के विरुद्ध कानून इस मामले में मील का पत्थर बनने वाला है।