शुक्रवार, 28 अप्रैल 2017

फर्क डी.एन.ए. का है

इन दिनों देश भर में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ तथा अन्य देशभक्त संस्थाओं के लोग केरल में हो रही राजनीतिक हिंसा के विरुद्ध शांतिपूर्ण धरने एवं प्रदर्शन कर रहे हैं। यों तो पिछले 50 साल से वामपंथी हमलों में वहां सैकड़ों कार्यकर्ता मारे जा चुके हैं। हजारों लोग अंग-भंग तथा नष्ट हो चुके कारोबार के कारण कष्ट भोग रहे हैं। मार्क्सवादी शासन में ये हिंसा और बढ़ जाती है। पिछले कुछ समय से यही हो रहा है। भारत में संघ और कम्यूनिस्टों में टकराव नयी बात नहीं है। आजादी से पहले संघ का काम बहुत कम था; पर जैसे-जैसे वह बढ़ा, उनमें टकराव शुरू हो गया। इसका कारण है दोनों के डी.एन.ए. में मूलभूत अंतर। 

संघ की स्थापना 1925 में डा. केशव बलिराम हेडगेवार ने नागपुर में की। वे जन्मजात देशभक्त थे। यह देशभक्ति किसी दुर्घटना या अंग्रेजों द्वारा किये गये दुर्व्यवहार से नहीं उपजी थी। यह उन्हें मां के दूध और घरेलू संस्कारों से मिली थी। आठ साल की अवस्था में उन्होंने रानी विक्टोरिया के राज्यारोहण की 60 वर्षगांठ पर स्कूल में बंटी मिठाई को कूड़े में फेंक दिया था। सरकारी भवनों पर हुई सजावट देखने से भी उन्होंने मना कर दिया था। सीताबर्डी के किले पर लगे यूनियन जैक को उतारने का भी उन्होंने बालसुलभ प्रयास किया था। प्रतिबंध के बावजूद अपने विद्यालय में ‘वन्दे मातरम्’ गुंजाया था। कोलकाता में पढ़ते समय क्रांतिकारियों के साथ और वहां से आकर कांग्रेस में काम किया। संघ की स्थापना से पहले और बाद में भी वे जेल गये। उनके मन में गुलामी की पीड़ा थी। अतः स्वाधीनता प्राप्ति की आग हर स्वयंसेवक के मन में भी जलने लगी।

संघ का डी.एन.ए. सौ प्रतिशत भारतीय है। उसने अपने प्रतीक और आदर्श भारत से ही लिये। भगवे झंडे को गुरु माना। देश, धर्म और समाज की सेवा में अपना तन, मन और धन लगाने वाले सभी जाति, वर्ग, क्षेत्र, आयु और लिंग के महामानवों को अपने दिल में जगह दी। हिन्दू संगठन होते हुए भी अन्य मजहब या विचार वालों से द्वेष नहीं किया। उन्हें समझने तथा शिष्टता से अपनी बात समझाने का प्रयास किया। शाखा के साथ-साथ निर्धन और निर्बल बस्तियों में सेवा के लाखों प्रकल्प खोले। अतः संघ धीरे-धीरे पूरे भारत में छा गया और लगातार बढ़ रहा है।

दूसरी ओर भारत में कम्यूनिस्ट पार्टी की स्थापना भी 1925 में मानवेन्द्र नाथ राय ने कानपुर में की थी; पर उनकी जड़ें तथा आस्था केन्द्र सदा भारत से बाहर ही रहे। उनका नाम भी ‘भारतीय कम्यूनिस्ट पार्टी’ न होकर ‘भारत की कम्यूनिस्ट पार्टी’ है। आज तक उन्होंने यह गलती ठीक नहीं की है। आजादी के आंदोलन के समय उन्होंने अंग्रेजों का साथ दिया और सुभाष चंद्र बोस को ‘तोजो का कुत्ता’ कहा। 1962 में चीनी सेनाओं के स्वागत में बैनर लगाये। चीन के तानाशाह नेता माओ को अपना भी नेता कहा। ये देशद्रोह नहीं तो और क्या है ?

ऐसे लोग दिल्ली के जे.एन.यू. और जाधवपुर वि.वि. आदि में देश की बरबादी के नारे लगाते हुए आज भी मिलते हैं। कश्मीर में आतंकी के मरने पर वे छाती पीटते हैं और नक्सलियों द्वारा भारतीय जवानों की निर्मम हत्या पर जश्न मनाते हैं। उनके प्रभाव वाले क्षेत्र में बंगलादेशी घुसपैठियों को आसानी से शरण मिलती है। वे स्वयं को राष्ट्रीय नहीं, अंतरराष्ट्रीय मानते हैं। रूस, चीन, क्यूबा जैसे देश उनके खुदा हैं। उनके आदर्श हैं मार्क्स, लेनिन, स्टालिन, माओ, चे गेवारा जैसे नेता, जिन्होंने लाखों लोगों को मारकर अपने देश में तानाशाही स्थापित की। इसलिए हिंसा और असहिष्णुता इनके डी.एन.ए. में शामिल है।

कम्यूनिस्ट भूलते हैं कि धर्म भारतीयों के खून में समाया है। जन्म से मृत्यु तक हर व्यक्ति के जीवन में धर्म का महत्वपूर्ण स्थान है; पर वे उसे अफीम बताते हैं। वे भूल गये कि रूस, चीन आदि में धर्म नहीं मजहब प्रभावी था। मजहबी नेताओं की जीवन के हर क्षेत्र में अनावश्यक घुसपैठ के विरुद्ध वहां विद्रोह हुए। धर्म और मजहब के अंतर को न समझने के कारण भारत को भी उन्होंने मजहबी चश्मे से ही देखा। लगातार गलत नंबर के चश्मे के प्रयोग से अब तो उनकी आंखें ही खराब हो गयी हैं। उन्हें हिन्दुओं का हर काम गलत दिखता है। वे राममंदिर, गोरक्षा और संस्कृत के विरोधी हैं; पर चर्चों में भ्रष्टाचार और मुस्लिम सामाजिक कुरीतियां उन्हें नहीं दिखती।

कैसा आश्चर्य है कि इतने साल बीतने पर भी उन्हें कोई सही भारतीय प्रतीक और आदर्श नहीं मिला। वे भगतसिंह को तो मानते हैं; पर उनके प्रिय गीत ‘मेरा रंग दे बसंती चोला’ को नहीं। बसंती रंग से वे ऐसे भड़कते हैं, जैसे लाल कपड़े को देखकर सांड। साहित्य में वे प्रेमचंद को तो मानते हैं, पर उनके धर्म और गोमाता प्रेम को नहीं। वे धर्म का विरोध तो करते हैं; पर वोट के लालच में दुर्गा पूजा भी मनाते हैं। यह ढकोसला ही उनके पतन का कारण है। 

वामपंथियों को आज नहीं तो कल यह समझना होगा कि यदि उन्हें भारत जैसे हिन्दू बहुल देश में अपना अस्तित्व बचाना है, तो भारतीय जड़ों से जुड़ना होगा। कई समझदार वामपंथियों ने जीवन के संध्याकाल में यह माना भी है। भारत में हर विचार और मजहब का सम्मान हुआ है। यहां यहूदी और पारसी भी बाहर से आये; पर उन्होंने भारतीयता को अपना लिया। इसलिए उनका तो विकास हुआ ही, देश के विकास में उन्होंने बहुत महत्वपूर्ण योगदान भी दिया। 

लेकिन लाख टके का सवाल यही है कि क्या वामपंथी अपने विदेशी डी.एन.ए. को छोड़कर ‘भारत माता की जय’ बोलेंगे ? अभी तो ऐसा नहीं लगता। आगे की भगवान जाने।

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